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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 156 में से

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पृष्ठ 99

७५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
ग्रीव की कथा में दोनों ही तथ्य विद्यमान हैं।
एक बार कपोतराज सपरिवार गगन से उड़ता हुआ
देशान्तर जा रहा था। वन के मार्ग में व्याध के द्वारा तण्डुल
विकीर्ण करके जाल बिछाया गया था। जिह्वा की लोलुपता
और भूख की व्याकुलता से पारिवारिक कपोतराज के बार-बार
मना करने पर भी उन चावलों के दानों पर टूट पड़े और जाल
में बंध कर पश्चाताप करते हुए एक दूसरे को दोषारोपित करने
लगे। पुन' कपोतराज ने समझाया, अब दूसरी भूल करके अपने
प्राणों को सङ्कट में मत डालो। सब एक साथ जोर लगा कर
उड़ चलो, फिर क्या था वृद्ध के अनुशासन और उनकी प्रेरणा
से जाल सहित उड़ चले। कपोतराज उन सबको अपने मित्र
हिरण्यक मूषकराज के पास ले गया। जहाँ उसके जाल काटने
पर वे सब मुक्त हुए।
इस आख्यायिका में बिना खेतों के निर्जन वन में चावलों
का होना भय की आशंका का द्योतक है, कपोतराज-गुरु के
उपदेश को अनसुना करने का फल सब का बंध जाना है।
इन्द्रिय-दासता और अशास्त्रीय व्यवहार का दुष्परिणाम मृत्यु
को निमंत्रण है। गुरु की करुणा से तथा स्वयं संगठन से ही
पुनर्जीवन प्राप्ति सम्भव है। कोमल कमल बाल के विसन्तु तथा
जीर्ण शीर्ण घास को बँट कर रस्सी बना लेने पर मदोन्मत्त हाथी
को बांध लिया जाता है। 'संघ में शक्ति' का इससे बढ़कर दूसरा
दृष्टान्त क्या हो सकता है ? आप लोग तो सब परिचित ही हैं
कि भारतीयों ने संघ शक्ति से ही स्वतन्त्रता प्राप्त की थी।
फिर भी न जाने क्यों ? हम अपनी इन्द्रियों को शक्तियों को
यों ही व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं, जिसे सञ्चित करके महान् शक्ति
अर्जित की जा सकती है। प्राचीन महर्षियों में यही विशेषता थी।
यहीं बैठे स्वर्ग की बातें जान लेते थे। महर्षि वशिष्ठ जी ने दिलीप
से कहा-"स्वर्ग की कामधेनु का तुम से अपमान हो गया है, जिसके