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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 156 में से

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पृष्ठ 107

८३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
भगवान् अपने सभी पात्रों को उनकी योग्यतानुसार रूप, धन,
विद्या, अधिकार आदि प्रदान करते हैं फिर इनका अभिमान ही
क्या ? क्योंकि इनका हमारे साथ सम्बन्ध भी शाश्वत नहीं
है । यौवन के साथ-साथ रूप ढल जायेगा, शरीर में झुर्रियाँ
पड़ जायेगी, कटि झुक जायेगी, पैर थक जायेंगे, कल का सुन्दर
आज कुरूप हो जायेगा । सिद्धार्थ को तो ऐसे वृद्ध को देखकर
ही संसार से वैराग्य हो गया था । यहाँ सब कुछ मिलता है,
परन्तु क्या किसी दुकान पर बिना बुढ़ापे की जवानी मिलती है,
बिना रंज के सुख मिलेगा या बिना मरण के जीवन मिल
सकता है ? है कोई ऐसी दुकान, जहाँ सदा मुस्कान ही मिले
थकान न हो । विचारक निश्चित ही जानते हैं कि ये सब किसी
बाजार में कहीं भी नहीं मिल सकते । प्यारे ! अभिमान तो
दैवी गुणों का ह्रास करके आसुरी-भावों को भर देता है । कपाट
बन्द करने से एकान्त नहीं होता, ओठ बन्द कर लेने से मौन
नहीं होता, क्योंकि तब मनोराज्य और भी अधिक प्रबल होने
लगता है भीड़ में होने पर भी मानव एकान्त में हो सकता है ।
थोड़ा विचार कीजिए । आप सब लोग जो यहाँ कथा
सुन रहे हैं वे सब लोग एकान्त में ही हैं क्योंकि सब की वृत्ति
केवल कथा-श्रवण में ही लगी है । एकान्तवास और मौन का
अभिमान व्यर्थ है । रूप; धन, विद्या, अधिकार ये सब आपको
भगवान् से मिले हैं । इनका सदुपयोग कीजिए तो जीवन में
सफलता मिलेगी और यदि अभिमान करके दुरुपयोग किया तो
विफलता और कष्ट ही मिलेगा । मानस में धनुष-भंग के प्रकरण
में जो दोहा हैं कि अभिमानी राजाओं ने धनुष तोड़ना चाहा,
तो टूटा तो नहीं वरन् और भारी होता गया । इसका भाव यह
है कि जब हम धर्मानुष्ठान द्वारा अभिमान को मिटाना चाहते
हैं तो धर्मानुष्ठान करने का एक और अभिमान बढ़ जाता हैं ।
धन, परिवार; उपलब्ध सुविधायें एवं पदार्थादि दुख नहीं