दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६०
वाली आप ही हैं। इसी दुर्गा देवी को यहाँ नौका बताया गया
गया है। आप ही विष्णु प्रिया लक्ष्मी तथा शिव प्रिया गौरी
हैं। अ. ४-११ ।।
मदिर-मदिर मुस्कानमयी चन्द्रानना पराम्बा पर भी महा-
मूर्ख महीष को क्रोध आया। उस पापी का उद्धार करने के कारण
ही उसी मुख को क्रोधावेश से कराल काल सम रौद्र करके
उसका उद्धार कर दिया। आप अपनी करुणामयी प्रसन्नता से
संसार का संरक्षण करती है, पालन करती है एवं क्रोधित होने
पर दैत्यों का सर्वनाश कर देती है, यह भी आपकी करुणा ही
है। १४।। आपके कृपा-पात्र जन ही सम्मान, धन और यश
पाते हैं, वे धन्य हैं। वस्तुतः भौतिक सम्पत्ति तथा तीनों एषणाओं
की उपलब्धि नाशमान होने के कारण क्षणिक है। अतः उनकी
प्राप्ति हो जाने पर भी सन्त-जन उन्हें धन्य नहीं कह सकते ।
भगवद्-भक्ति सम्पन्न पुरुष ही धन्य हैं—
सो कुल धन्य उमा सुन, जगत पूज्य सुपुनीत ।
श्री रघुवीर परायण जेहि, नर उपज विनीत ॥ मानस से स्पष्ट है
इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है-
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन ।
अपार सेवित सुख सागरेऽस्मिन्, लीना परे ब्रह्मणि यस्य चेताः ॥
जो व्यक्ति अपार सुखों से सेवित इस संसार में अपने
चित्त को ब्रह्म में लीन किये हुये हैं, ऐसे महापुरुषों से ही कुल
पवित्र होता है, ऐसे पुत्र की सौभाग्यवती माता का जीवन
सार्थक है, और उसी से यह वसुओं को धारण करने वाली
वसुन्धरा-धरती माँ पुण्यवती है अतः ऐसे व्यक्ति ही धन्य हैं।
हे देवी ! आपकी कृपा प्राप्त सज्जन श्रद्धालु जन
धर्माचरण करके स्वर्ग प्राप्त करते हैं । हे माँ दुर्गे ! स्मरण
मात्र से सभी प्राणियों का दुःख हरण करने वाली आप ही हैं,