दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६४
पञ्चमोऽध्याय
ध्यानम्-ॐ घण्टाशूलहलानि शंख मूसले चक्रं धनुः सायकम्
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशु तुल्य प्रभाम् ।
गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधार भूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वती मनुभजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम् ॥
जिनके कर कमल घण्टा, शूल, हल, शङ्ख, मूसल, चक्र,
धनुष और बाण से सुशोभित है, शरद कालीन दुग्ध धवल
ज्योत्स्ना से ज्योतित चन्द्रमा के समान जिनकी मनोहर कान्ति
है, जो तीनों लोकों की आधार हैं जो शुम-निशुम्भादि दैत्य
संहारिणी हैं, माँ गौरी-पार्वती के शरीर से जिनका प्राकट्य
हुआ है उन महा सरस्वती देवी को मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ,
आराधना करता हूँ ।
विनियोगः-ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः,
महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्छन्द-भीमा शक्ति, भ्रामरी
बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेद स्वरूपम् महासरस्वती प्रीत्यर्थे
उत्तर चरित्र पाठे निनियोगः ॥
यह उत्तर-तृतीय चरित्र है । जीव में राग-द्वेष, अस्मिता
अविद्या, क्लेशों के कारण ही दुःख आता है । वह नित्य मुक्त
होने पर भी बन्धन का अनुभव करता है । प्रथम चरित्र में
राग-द्वेष का नाश हुआ है । द्वितीय चरित्र में अनन्त कुप्रवृत्तियों
सहित अस्मिता (अहङ्कार) का विनाश हुआ । अविद्या से ही यह
प्रपञ्च प्रतीत हो रहा है । अविद्या के कारण ही जीव-सृष्टि
है, जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे प्रबल विकार उदय होते
हैं । संसार या जीव-सृष्टि का अर्थ "मेरा-तेरा" है । यही मेरा-
तेरा ही दुःखद है । इसे यों समझिये—धन बाहर है, बैंक में है,
उसके प्रति ममता होने के कारण उसके जाने पर दुःख होता