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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 156 में से

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पृष्ठ 104

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८०
तो धन चले जाने से त्यागी होने का अभिमान भी उससे कम
नहीं होता । भगवान् ने तो 'अहंकार विमूढात्मा' से इसी को
स्पष्ट किया है । यहाँ तक कि त्यागी का अभिमान भी जब घटने
लगता है तब निरभिमानी का वेश बनाकर अभिमान जिन्दा
रहना चाहता है, उसको दबाने का भाव भी बहुत अच्छा है ।
क्योंकि जब-जब इसको दम्भ की सहायता से दबाया जाता है,
तब-तब जितना अंश शेष रहता है, उतना ही वेश बदल कर
दूसरों को दबाना चाहता है । इसके बाध या बध का उपाय
कटिन कृपाण ही है । इसको गीता में-
‘असङ्ग शस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ से इसके बध का स्पष्ट साधन
कहा गया है । श्री मद्भागवत में इसके बहुत प्रयोग हैं-
एवं गुरुपासनयैक भक्त्या, विद्या कुठारेण शितेन धीर ।
विवृश्चजीवाशय अप्रमत्त, सम्पद्य चात्मानमथत्यजास्त्रम् ॥
भाग० ११/१२/२४
पराभक्ति (परा विद्या) द्वारा ज्ञान-कृपाण को गुरूपासना
की शाण से तीक्ष्ण धार करके जीव-भाव (अहंकार) को काटना
है । पराम्बा की चरण-शरण लिए बिना यह अहंकार नहीं मारा
जा सकता । इसके द्वारा ही जीव ईश्वर अंश होते हुये भी दुःखी
हो रहा है ।
इस दार्शनिकता को सहज समझने के लिए एक आख्यान
प्रस्तुत है । एक राजा अपने दरबार में अपनी रानी तथा मंत्रियों
सहित राज सिंहासन पर आरूढ़ था । राजा ने कहा-देखो
महारानी ! मेरे राज्य में सभी लोग मेरी ही आज्ञा से कार्य
करते हैं । एक भी व्यक्ति मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर
सकता । मेरे राज्य में देवता भी मेरी आज्ञा का पालन कर रहे
हैं । रानी ने व्यंगात्मक मुसकान बिबेर दी । राजा ने निश्चय
कराने के लिए मंत्री को आदेश दिया-जो कोई व्यक्ति जा रहा
हो, उसे मेरे पास लाओ और पूछो-मेरी आज्ञा में हैं या नहीं,