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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 156 में से

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पृष्ठ 110

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८६
चतुर्थोऽध्यायः
ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररि कुल भयदां, मौलिबद्धेन्दुरेखाम्,
शंखं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंह स्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीम्,
ध्यायेद्दुर्गा जयाख्यां त्रिदश परिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ॥
इच्छा-पूर्ति-हेतु सेवा में संलग्न पुरुषों तथा देवताओं से
से घिरी हुई (जया नाम वाली) दुर्गा को नमस्कार है। काले
मेघ की कान्ति के समान श्यामाङ्गा, कटाक्षों से शत्रु-समूह के
लिए भय दायिनी, ललाट पर चन्द्र-धारिणी, हाथों में शङ्ख, चक्र,
कृपाण और त्रिशूल धारिणी, त्रिनेत्रा, सिंह स्कन्धारूढ़ा, अपने तेज
से तीनों लोकों को व्याप्त करने वाली माँ दुर्गे का ध्यान करना
चाहिए ।
इस अध्याय में स्तुति की गई है—'स्तवनं स्तुतिः' कर्ता में
प्रत्यय का अर्थ है—अपनी भाषा में अपने भावों को अपने इष्ट-
देव के सामने बड़े प्रेम से निवेदन करना । स्तूयतेऽनेनेति स्तोत्रम्,
जो दूसरों की कृति पढ़े वह स्तोत्र है और जो अपने प्रियतम के
प्रति कृतज्ञता अर्पित करते हुए कुछ मांगना हो, तो वह प्रार्थना
कहलाती है । ये सभी भावों की गरिमा से परिपूर्ण होनी चाहिए ।
हृदय का स्नेह-प्रेम ही अहङ्कार को गला देता है । जैसे लाख -
(चपड़ा) कठोर होती है, किन्तु अग्नि से सम्पर्कित होते ही पिघल
जाती है, तब मुहर लगाई जाती है । तत्पश्चात् कपड़ा भले ही
फट जाय, किन्तु मुहर नहीं मिटती है । वस्तुतः महत्त्व भी मुहर
का है, वही प्रामाण्य आधार है । इसी प्रकार पिघले हृदय से
अपने इष्टदेव के सामने उसके नाम रूप गुणों की मुहर लगानी
चाहिए । यही स्तुति है—प्रियतम मिलन की तीव्र उत्कण्ठा,
बेचैनी ही जीवन में रस लाती है—
मिलता है सच्चा सुख केवल,
जगदम्बे तुम्हारे चरणों में ।