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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८२
दीपक है। इसी प्रकार हमारे शरीर में अन्तःकरण और इन्द्रियों
की सभा लगी है। आत्मा साक्षी सबको प्रकाश दे रहा है।
योग योगेश्वर कृष्ण ने अहंकार की वीभत्सता एवं उससे
मुक्ति का कितना सुन्दर सहज उपाय बताया हैं, उन्हीं के शब्दों
में देखिए और आचरण कीजिए-
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्म भूयाय कल्पते ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्‌भक्तिं लभते पराम् ॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ।
गीता १८/५३-५५
अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहादि दोषों के
नाश होने पर पराभक्ति प्राप्त होती है, जिसमें कुछ चाह नहीं,
कोई अन्य राह है नहीं। सभी प्राणियों के प्रति भगवद् भाव
जागृत हो जाता है। तब इस भक्ति के द्वारा ही दिव्य ब्रह्मात्मैक्य
बोध होता है।
दुर्गा-सप्तशती में मध्यम चरित्र जवानी का है। जवानी
में ही अभिमान अपने पूर्ण यौवन पर होता है। इसके मद में हम
अपने भगवान् को भी अन्यायी तक कहने में नहीं चूकते, जबकि
भगवान् अपनी प्रिय सन्तान पर सदैव करुणा की वर्षा करते
रहते हैं। भगवान् कहते हैं 'सब पर मोरि बराबरी दाया', केवल
दया ही बराबर नहीं है, अपितु समस्त प्राणियों में मनुज अधिक
प्रिय है, उनके कथन पर दृष्टिपात कीजिए-
सब मम प्रिय, सब मम उपजाये,
सबसे अधिक मनुज मोहि भाये ।
और इनका कृतज्ञ होना चाहिये । कुशल सूत्रधार की तरह