दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६२
हे माँ ! शत्रुनाश करके आपने संसार की रक्षा की,
दुष्टों को स्वर्ग में वास दिया, और हम लोगों को उनसे निर्भय
बना दिया । आपको बारम्बार नमस्कार है । आप शूल से,
तलवार से, घण्टा ध्वनि से, धनुष की टंकार से, चारों दिशाओं
में हमारी रक्षा करें । २६ ।
इस प्रकार देवताओं ने पराम्बा की बड़े प्रेम से स्तुति की-
अब तुम्हारे हो चुके माँ, अब शरण में ले लो हमें ।
सर्वस्व अपना खो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
जप-जोग ईश आराधना, तप नियम की जो साधना ।
सबसे विरक्त अब हो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
निज बात पीड़ाओं से भरी, करुणार्द्र होकर तुमसे कही,
चरणों में गिरे, बहुत रो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
माँ शरण में ले लो हमें ॥
पराम्बा ने देवों की स्तुति से प्रसन्न होकर वरदान
माँगने को कहा । तब देवताओं ने कहा-माँ ! हमारा यही
मनोरथ था कि संसार में आसुरी भाव नष्ट हो जायें । जब
व्यष्टि या समष्टि में दैवि गुणों का ह्रास और आसुरी भावों
का विकास हो जाता है । तब अम्युदय और नि श्रेयस दोनों
की हानि होती है । आपने कृपा करके विश्व का कल्याण किया
है । अब जब-जब ऐसी संकटमयी अवस्था आवे तो हमारे
स्मरण-मात्र से आप दर्शन देकर संकट दूर करें । यही
अभीष्ट है ।
इन स्तोत्रों को जो पढ़ेंगे उन्हें सब प्रकार की सुख-
सम्पत्ति की प्राप्ति होगी, प्रसन्न होकर आप हमें यही वरदान
दें । तथास्तु कहकर माँ जगदम्बे अन्तर्धान हो गईं ।
जब कोई न हो तेरा, तब माँ की शरण ले लेना ॥ १
संसार के जीवों पर कभी, आशा न किया करना ।
जब कोई न हो तेरा, तब माँ का नाम लिया करना ॥ २