दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
वाले सामवेद की आधार आप ही हैं। यहाँ स्तुति में प्रतिपाद्य
तत्व की ओर संकेत है—“वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” सभी वेदों का
प्रतिपाद्य तत्व 'अहं' आत्मा ही है। आप ही त्रयी-तीनों वेद
स्वरूपा एवं सर्व ऐश्वर्य सम्पन्ना हो तथा जगत पालन हेतु वार्ता-
(खेती बाड़ी) आप ही हैं, त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक)
विनाशिनी भी आप ही हैं ॥ १० ॥ सर्व-शास्त्र मर्मज्ञ के लिए
आप ही धारणा-शक्ति मेधा हैं। आप अनासक्त होकर सभी का
पालन करती हैं।
दुर्गा शब्द पारिभाषिक है-
मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञान रूपिणी ।
ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्य साक्षिणी ।
यस्या परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।
तां दुर्गा दुर्ग मां देवीं दुराचार विघातिनीम् ।
नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णव तारिणीम् ॥
देव्यथर्व शीर्ष २४-२५
इस संसार को सागर या समुद्र इसलिए कहा गया है कि
इसमें अगाध अथाह जलराशि होने पर भी यह किसी प्यासे की
प्यास नहीं बुझा सकता। यही दशा संसार की है, असंख्य सुख-
सुविधा की सामग्री होते हुए भी किसी की प्यास की
(अभिलाषाओं एवं कामनाओं की) तृप्ति नहीं हो सकती है।
प्रत्येक पदार्थ पैदा होता है कुछ क्षणों के बाद समाप्त हो जाता
है—“भवन्तीति भूतानि” ऐसा भव-संसार क्षार जल से युक्त ही
नहीं अपितु विषय-विष से परिपूरित सागर है जिसमें मनोराज्य
की उत्ताल तरङ्गें उद्वेलित होती रहती हैं। इस भवसागर को
पार कराने वाली ब्रह्म विद्या ही है। इसी का नाम दुर्गा है-
सभी मंत्रों में मातृका, मूल अक्षरों में, शब्दों में अर्थ रूप से,
ज्ञान में चिन्मयातीता एवं शून्यों में उनकी साक्षीरूपा श्रेष्ठ देवी
दुर्गा जी हैं। पापियों को दण्डित करने वाली, सज्जनों को तारने