दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८८
विषय करण सुर जीव समेता । सकल एक ते एक सचेता ।
(मानस)
इसी परम तत्व के लिए यहाँ संकेत है ।
महिषासुर के मरने पर देवों ने माँ जगदम्बे की स्तुति की
है, क्योंकि महिष-भैंसा और गधा दोनों किसी दूसरे की नहीं
सुनना चाहते हैं, अपने में चोट लगने की चिन्ता नहीं, टूट जाये
पर झुकेंगे नहीं । अतः इनके नष्ट होने पर ही दैवी गुण विकसित
होते हैं तभी स्तुति होती है कि जो ऐसे असुर हैं उनके लिए
आप दरिद्रता रूप से अनुभव की जाती है और जो सत्पुरुष
श्रद्धालु हैं; उन्हें आप लक्ष्मी रूप में, बुद्धि रूप तथा लज्जा रूप
से अनुभव में आती है---भाव यह है कि शक्ति तो एक ही है;
किन्तु अपनी सद्भावना के अनुसार दर्शन होते हैं-
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ॥
(मानस)
सज्जनों को कुकर्म करने से लज्जा रूप होकर तुम्हीं
बचाती हो और सत्कर्म करने के लिए सद्बुद्धि बनकर प्रेरित
करती हो ॥ ५ ॥
इसी से आप अवर्णनीय हैं, वाणी, मन, से अतीत अगोचर
हैं । आप ही जगत की कारण हैं, क्योंकि ब्रह्म तो उपादान
कारण हो ही नहीं सकता । अतः माया रूप से तुम ही मूल कारण
हो । यद्यपि त्रिगुणात्मिका रूप हो, तथापि गुणों के दोष से रहित
हो, क्योंकि गुणों की साक्षी होने से सम्बन्ध नहीं है । सभी देवों
की आप ही आश्रय हैं । आप आदि भूत अव्याकृता परा प्रकृति
है ॥ ७ ॥ देवताओं की तृप्ति रूप स्वाहा तथा पितरों की तृप्ति
रूप से स्वधा आप ही हैं ॥ ८ ॥
मुक्ति का साधन खोजने वाले, निर्दोष, पवित्र हृदय वाले
जितेन्द्रिय, तत्वग्राही मुमुक्षु महात्माओं के लिए आप परा विद्या
हैं ॥ ६ ॥ आप शब्द स्वरूपा हैं, पवित्र ऋक्-यजु एव उद्गीथ