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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७८
के लिए गर्ज ले। यहीं मेरे हाथ से तेरो मृत्यु हो जाने पर शीघ्र
ही देवता भी गर्जना करेंगे।
माँ ने मधु पान कर उससे युद्ध करना प्रारंभ कर दिया।
युद्ध में वह दैत्य कभो भैंसा, कभी सिंह, कभी हाथी का रूप
धारण करके लड़ रहा था। माँ ने भयंकर युद्ध किया और उसे
पैर से दबाया, जिससे रूपान्तर न कर सके, किन्तु पैरों से आधे
शरीर से निकलकर रूप बदल कर भागने लगा। तभी माँ ने
अपनी कठिन कृपाण से उसका शिरश्छेदन कर दिया।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्
ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निज मुखात्ततः ।
अर्ध निष्क्रान्त एवासीद् देव्या वीर्येण संवृत ।।
अर्ध निष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः ।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥
ततो हा हा कृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् ॥ ३/४०-४३
अब इस पर विचार करते हैं—महिषासुर - अस्मिता
देहाभिमान है; इसकी सेना कुप्रवृत्तियाँ हैं, सेनानायक रूप विद्या,
धन, अधिकार है। व्यक्ति इन्हीं चार का अभिमान करता है।
इन्हीं में दुर्धर्ष—दूसरों को पीड़ित करना, दुर्मुख—दूसरों को अप -
वचन कहना है। जब परा-विद्या की कृपा से साधक में यह
निश्चय हो जाता है कि; जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षण
भंगुर है—
मत कर तू अभिमान, जगत में दो दिन का मेहमान
हिरणाकश्यपु सम वरदानी, रहे न रावण से अभिमानी।
अर्थात् जिस रूप, विद्या, धन, अधिकार को लेकर अभिमान
किया जाता है ये तो मिथ्या स्वप्नवत है। यह निश्चय ही बाध
कहलाता है और यही वध शब्द का भाव है—वध एव बाधा।
अब जब मिले हुए पदार्थ मिथ्या ही हैं, आने जाने वाले ही हैं,
घटने-मिटने छूटने वाले हैं, तब भला उनके मिलने पर इतराने