दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
निरुद्ध अवस्था में शान्त हो जाता है । पहले सम्पूर्ण इन्द्रियों में
बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करो, तब ज्ञान की बातें समझ
में आयेंगी । संकल्प में बहुत बड़ी शक्ति होती है किन्तु जब तक
वह प्रकट नहीं होती, तब तक उसका लाभ नहीं मिल पाता है ।
अधिक उहात्मक कल्पनाओं में विचरण करने वालों का मन
बिखर जाता है । कुछ देर तक मन को शान्त करके देखो, तो पता
चलेगा, उसमें कितनी अपार शक्ति है ? जब हम इन्द्रियों से
संयम से कार्य लेते हैं, तब उनकी शक्ति बढ़ती है । शान्त मनः
स्थिति को ही स्थित प्रज्ञ कहते हैं । तभी सच्चे अर्थों में माँ की
कृपा से ही अभिमान के महिषासुर का वध होता है । कुप्रवृत्तियों
की दैत्य सेना हा हा कार करती हुई पलायन करती है ।
महर्षियों सहित इन्द्रियों के देवता माँ भगवतीकी स्तुति करने
लगते हैं—
माँ की स्तुति
दरबार तुम्हारा देख लिया, माँ प्यार तुम्हारा देखेंगे ।
अपना बनाकर तुमको देख लिया, आँखों में बसाकर देखेंगे ॥
तेरे प्यार में लाखों भक्त लुटे, लुटकर ही उन्हें कुछ पाना है।
तेरे प्यार में जो मिट जाते हैं, वह हम भी नजारा देखेंगे ॥
तेरे प्यार में क्या-क्या जादू है, अब तक तो कोई ना जान सका ।
जो जान गया वह मान गया, माँ हम भी मनाकर देखेंगे ॥
चरणों में तुम्हारे आ बैठा, हाथों का सहारा दे देना ।
शरणागत को वरदान मिले, माँ हार बना कर देखेंगे ॥