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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

६१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
और स्वस्थचित्त से कृतज्ञता पूर्वक स्मरण करने वाले पुरुषों का
सद्बुद्धि-देने वाली आप ही हैं । दया से आर्द्र-चित्त वाली सदैव
अपने भक्तों का उपकार करने वाली उनके दुःख, दारिद्र एवं
भयनाशिनी तुम ही हो । माँ के दो विशेषण बड़े मधुर एवं
यथार्थ हैं-(१) करुणा पूरित नयना (२) सदाऽऽर्द्रचित्ता ।
अर्थात् अपने प्यारे पुत्र के लिये जिनके नेत्रों में सदा
करुणा भरी रहती है और हृदय स्नेह से सदैव सिक्त (गीला)
रहता हैं । भक्त और अभक्त दोनों के लिये माँ सदा करुणा ही
बरसाती है, क्योंकि उनका क्रोध भी मुक्ति-प्रदायक है । १७ ॥
निर्वाण दायक क्रोध जाका (मानस)
हे देवि ! दुष्टों के दलन से जगत को सुख मिले और
उन्हें स्बर्ग मिले; इसी उद्देश्य से आप उनका संहार करती हैं ।
यह भी आपकी करुणा ही हैं कि अस्त्र-शस्त्रों का उन पर
प्रयोग करके उन्हें पवित्र करती हो, अन्यथा अपनी दृष्टिमात्र से
भस्मीभूत कर सकती हों । १६ ।
हे माँ ! यह आपके दिव्य-मुख-दर्शन का हो पुण्य फल
है जो आपकी तलवार की चमचमाहट तथा त्रिशूल की अनुपम
प्रभा से उनकी आँखें नहीं फूटी। हे देवी ! दुष्टों की दुष्टता
दूर करना और अनुपमेय बल तथा पराक्रम का उन्हें प्रदर्शन
करा देना ही आपका उनसे युद्ध करने का प्रयोजन है ।
हे वरदायिनी ! आपका पराक्रम अतुलनीय है, मनोहर
अनिन्द्य रूप हैं । धन्य हैं आप, जिनके हृदय में करुणा और
कृपा का अपार सागर तरङ्गयित है और युद्ध में दुष्टों के लिये
दग्ध करने वाली अपार ज्वाला ज्वलित रहती है । ये दोनों
बातें एक साथ आप में ही हैं । एक कुम्हार घड़े में भीतर हाथ
लगाकर बाहर दूसरे हाथ से जोर से थपकी की चोट से ठोकता
है जिससे घड़ा सुन्दर, सुघड़ एवं संस्कार युक्त बन जाता है ।
इसी प्रकार आप भी दोनों कार्य एक साथ ही करती हैं ।