दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
तृतीयोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ उद्यद्भानुसहस्र कान्तिमरुण क्षौमां शिरोमालिकाम्,
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्द श्रियं,
देवीं बद्धहिमांशु रत्नमुकुटां वन्देऽरविन्द स्थिताम् ।
उदयकालीन सहस्रों सूर्य की कान्ति के समान श्री अङ्गों
से कान्तिमान, रक्तिम वर्ण, रेशमी साड़ी से सुशोभित, गले में
मुण्डों की माला से अलंकृत, लाल रंग के चन्दन से चर्चितस्तन
शोभिता, कमल रूपी करों में जप माला, विद्या, अभय तथा वर
मुद्रा धारण किए हुए तीन नेत्रों से कमल मुख की शोभा वर्द्धिता,
मस्तक पर चन्द्रमा सहित मणि माणिक्यादि रत्न-जटित-मुकुट
धारिता, कमलासन विराजिता माँ जगम्दबे को मैं प्रणाम करता
हूँ ।
महात्मा मेधा ऋषि ने पराम्बा को प्रणाम करके कहा—
हे राजन् ! महिषासुर की सेना के समाप्त होने के पश्चात् सेना-
नायक क्रमशः माँ से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े । ‘दम्भाहंकार
संयुक्ता’ की उक्ति के अनुसार अपने को बहुत बड़ा वीर समझ कर
लड़ने लगे । माँ ने चिक्षुर का संहार किया । चामर को सिंह ने
मार दिया । दुर्मुख और दुर्धर्ष भी दोनों माँ की तीक्ष्ण कृपाण से
मारे गये । यह देखते ही अपने को असहाय सा समझ कर जोर-
जोर से गर्जता हुआ महिषासुर माँ के सामने अस्त्र-शस्त्र बरसाने
लगा ।
तब माँ ने कहा—
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ः, मधु यावत्पिबाम्यहम् ।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ ३/३८
अरे मूर्ख ! जब तक मैं मधुपान करती हूँ, तब तक क्षण भर