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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 156 में से

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श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७६
कारण पुत्र नहीं हुआ है; अतः नन्दिनी की सेवा करो ।" यह
जादू मन की सङ्कल्प शक्ति का है । मन में बहुत शक्ति है किन्तु
व्यर्थ-चिन्तन से नष्ट होतो रहती है ।
ऐसे ही प्रत्येक इन्द्रियों में शक्ति है, उसे बचाओ, सुरक्षित
रक्खो, समय पर वही महाशक्ति का काम दे सकती है और
अहंकार की सारी कुप्रवृत्तियाँ नष्ट कर सकती हैं । 'समस्त सेना
ध्वंस कर डाली गई ।' महाशक्ति के निश्वास से निकले हुए गण
ही तो देवी जी की सेना बन गये । उन्होंने ही महिषासुर की
सेना का संहार किया-
निश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ।
त एव सद्य सम्भूता गणाः शत सहस्रशः ॥२/५२-५३
यही गण मन की संकल्प शक्ति से प्रकट होते हैं । दृढ़
संकल्प में बहुत शक्ति होती है । शुक्ल यजुर्वेद के प्रथम अध्याय
में 'शिव-संकल्पमस्तु' के छः मंत्र हैं । उन्हें ध्यान से पढ़ने पर
मन का रहस्य व्यक्त हो जाता है । जब सारी सेना नष्ट हो
जाती है; तब राजा भी अकेला लड़ने में असमर्थ हो जाता है ।
हमारे आसुरी भावों में जो कुप्रवृत्तियाँ उपद्रव करती हैं, उन्हें
ईश्वराराधन, दृढ़ वैराग्य, भक्तिभाव की पराकाष्ठा और दृढ़
संकल्प के द्वारा नष्ट किया जा सकता है । यही द्वितीय अध्याय
का सारांश है ।
'शुभं - भूयात्'
हे मात भवानी जग जननी, संकट हरणी मन भरने दो ।
हम सब माँ तेरे बालक हैं, हमें चरण तले निज रहने दो ॥
देव पड़े जब विपदा में, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गर्जी, फिर रूप वही दरसाने दो ॥