दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ें[header] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८४
देते, दुःख देता है उनका अभिमान । श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत
शमीक ऋषि के पुत्र ने जब राजा को शाप दिया, तो ऋषि को
दुःख हुआ कि मैंने इस अपरिपक्व बुद्धि वाले को इतना सामर्थ्य
देकर ठीक नहीं किया; अन्यथा अहंता से अधिक क्षमता वाला
व्यक्ति उसका दुरुपयोग कर बैठेगा, जो समाज के लिये घातक
होता है ।
दान देने वाले को यह भी देखना चाहिए कि दान लेने
वाले में मेरे द्वारा दिये गये दान को पचाने की शक्ति भी है या
नहीं; यह याचक, रोगी, शिष्य सभी पर समान रूप से चरितार्थ
है । इन्द्र जब उसका कवच दान लेकर चलने लगा तो उसके
पाँव जमीन से उठे नहीं; तो आकाश वाणी हुई—इतना बड़ा
दान लिए जा रहे हो उसके बदले कुछ दिया क्यों नहीं ? तब
इन्द्रदेव ने एक शक्ति दी, जिसका प्रयोग घटोत्कच्छ पर किया
गया था ।
महाभारत के युद्ध के प्रारम्भ में दोनों सेनायें आमने
सामने खड़ी हैं और भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को गीतोपदेश दे
रहे थे; तब दुर्योधन ने भीष्म पितामह से कहा "देखिए, वह
चरवाहा कृष्ण अर्जुन के कान भर रहा है, शीघ्र आक्रमण कर
दीजिए । पितामह ने कहा-"भगवान् कान नहीं भर रहे हैं,
वरन् अर्जुन को दिव्य-संदेश दे रहे हैं; जिसका एक शब्द भी
जीवन में उतर जाये तो जीवन धन्य हो जाये परन्तु इस दिव्य-
सन्देश के योग्य-पात्र एकमात्र अर्जुन ही है । जब तक श्री कृष्ण
की इच्छा नहीं होती, तब तक मेरे चाहने पर भी युद्ध प्रारम्भ
नहीं हो सकता । अरे ! यह युद्ध तो श्री कृष्ण का एक खेल तमाशा
है । यदि उस दिव्य संदेश को सुन सको तो सुनो, अन्यथा चुपचाप
खड़े रहो ।
मूढ़ भाव (तमोगुण) में मानव सोता है, रजोगुण से कर्म
प्रवृत्त होता है सतोगुण में भगवान् की ओर उन्मुख होता है तथा