दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५८
तक मूल में देख सकते हैं। ब्रह्मा जी स्तुति करते हैं, तुम्हीं स्वाहा
(देवताओं का भोजन), तुम्हीं स्वधा (पितरों का भोजन),
तुम्हीं वषट्कार हो। तुम्हीं नित्य अक्षर प्रणव में अकार,
उकार, मकार इन तीन मात्राओं के रूप में हो। इनके
अतिरिक्त जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता वह बिन्दु
रूपा, अर्द्ध मात्रा रूपा भी तुम्हीं हो। यहाँ दार्शनिकों के लिए
स्पष्ट किया गया है कि जिस परमात्मा का वाचक प्रणव है—
तस्य वाचकः प्रणवः, वही ओंकार पराम्बा का स्वरूप है अथवा
पराम्बा ही ओंकार स्वरूपा है।
पुनश्च:—हे देवी ! तुम्हीं सन्ध्या सावित्री हो, सृष्टि स्थिति,
संहारकारिणी हो; तुम्हीं महा-विद्या, महा-मेधा, महास्मृति,
तुम्हीं प्रकृति और तुम्हीं बोध स्वरूपा बुद्धि हो। तुम्हारे सभी
आयुध कल्याणकारी हैं। तुम्हीं सुन्दरता का स्रोत हो, परा और
अपरा दोनों से परे तुम्हीं हो। जो कुछ भी दिखाई, सुनाई या
प्रतीति हो रही है, वह सब कुछ तू ही तू है।
जब भगवान् को भी तुमने निद्रा-निमग्न कर दिया है, तब
भला तुम्हारी स्तुति किस शक्ति से की जाये, क्योंकि शक्ति तो
तुम स्वयं ही हो। अब कृपा कर इन दोनों दैत्यों को मोहित कर
भगवान् को जगा दो, जिससे जगकर आपकी शक्ति पाकर वे
इन दोनों को मार डाले।
इस प्रकार स्तुति करते ही महा माया योग-निद्रा भगवान्
विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकल कर
ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हो गई। भगवान् जग गये, उन्होंने
देखा, दो विशाल दैत्य ब्रह्मा जी को खाने का प्रयत्न कर रहे हैं।
तत्काल भगवान् ने उन्हें ललकारा—युद्ध प्रारम्भ होकर पाँच
हजार वर्षों तक चलता रहा; किन्तु विजयश्री ने किसी का वरण
नहीं किया। उसी समय महामाया ने उन दैत्यों को मुग्ध कर
दिया; जिससे वे भगवान् से बोले—
५६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्”
हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं, जो चाहो, वरदान माँग लो ।
तब भगवान् ने कहा—‘भवेतामद्य मे तुष्ठौ मम वध्यावुभा-
वपि । किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम । ६८ । यदि तुम
लोग मुझसे प्रसन्न हो, तो मेरे हाथ से मारे जावो, यही वरदान
दीजिए । यह सुनकर वे बोले—जहाँ पृथिवी पर जल की बूँदें न
हों न सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो । भगवान् कमल नयन
ने ‘तथास्तु’ कहकर विराट स्वरूप धारण कर दोनों के सिर
अपनी जङ्घाओं पर रख कर चक्र से काट डाले । इस प्रकार वह
महामाया ब्रह्माजी की स्तुति से प्रकट हुई थी ।
कथा पर विचार करने से स्पष्ट भाव प्रकट होता है कि
सर्वत्र व्याप्त परमात्मा विष्णु भगवान् हैं समस्त दिशायें उनके कान
हैं । भागवत् में कहा है—इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्रः कर्णौ दिशः
श्रोत्रममुष्य शब्दः । २/१/२६ इसी से भक्त उन्हें कहीं से भी
पुकारें; वे तुरन्त सुन लेते हैं । “चींटी के पर नूपुर बाजे वह भो
साहब सुनता है ।” यह प्रसिद्ध उक्ति है । आत्मशंसा एवं परनिन्दा
सुनना इन दिशाओं रूपी कानों का मैल है । यही दोनों मधु
और कैटभ हैं, दोनों का अर्थ एक ही है । जिन लोगों को दूसरे
की निन्दा करने सुनने में रस आता है, मिठास आता है—यही
मधु-मीठा राग है—सुन-सुन कर पैदा होने वाले दोनों दैत्य हैं—
‘रज्यतेऽनेनेति रागः । पाणिनिजी का सूत्र है तेन रक्तं रागात्’
जिससे चित्त-हृदय रङ्गीन हो जाता हैं वही राग है । आजकल
स्कूल कालेजों में बालक बालिकायें परस्पर एक दूसरे की
क्षणिक विशेषतायें सुनकर परस्पर मुग्ध हो जाते हैं । माता-
पिता शास्त्र का विधान अलग कर देते हैं । यह प्रेम नहीं राग
है, मीठी जंजीर है-बाँधने वाली है । जो लोग कान के कच्चे
होते हैं उनको तो यह राग पैदा करते देर नही लगती । इसी
प्रकार द्वेष है—‘द्विगुणितं विषमितिद्वेषः’ दूना जहर है ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६०
कीटवद् भाति कीटभ एव कैटभः एक कीड़ा ऐसा होता है जो
लकड़ी में छेद कर देता है । छोटा कीड़ा इतनी कठोर लकड़ी
को छेद डालता है—यही द्वेष है, शत्रु है शातनात् शत्रुः जिसके
चिन्तन मात्र से दिल दिमाग में छेद होता रहे, ऐसा विचित्र
शत्रु है यह द्वेष । जिस वस्तु, व्यक्ति से द्वेष हो जाता है वह
व्यक्ति नगर से, देश से क्या पृथ्वी से भी चला जाय, किन्तु
हृदय पटल से विलीन नहीं होता, उसका नेगेटिव फोटो चित्त
में अंकित हो जाता है, जो चिन्तन करने से दुःख दग्ध करता
है । शत्रु बाहर के नहीं, बाहर नहीं अपितु अपने ही हैं और
अन्दर से ही हैं जो राग-द्वेष के रूप में रहते हैं इन्हीं से जीव-
बंधा हुआ है ।
इन्हीं से सजग करने के लिए गीताकार कहते हैं—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे, राग द्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३-३४ ॥
अर्थात् इन्द्रियों का विषयों पर सहज राग-द्वेष निश्चित
है । अतः बड़ी सावधानी से इन दोनों राग-द्वेष शत्रुओं से बचना
चाहिए; लक्ष्य में ये ही बाधक हैं । जिन्होंने इन दोनों को जीत
लिया, वे ही परम प्रसाद के अधिकारी हैं ।
राग द्वेष वियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६४ ॥
राग-द्वेष रूपो लुटेरों से सुरक्षित रहते हुए जिसकी इन्द्रियाँ
विषयों के प्रति सहज भाव से व्यवहार करती हैं-न किसी वस्तु
के पाने की आकांक्षा है न किसी पदार्थ से विरोध या घृणा; न
किसी से अटके न सटके, ऐसे साधक साध्य को शीघ्र प्राप्त कर
लेते हैं । इन्द्रिय दास को मानसकार ने अभागी शब्द से
सम्बोधित किया है—
उमा कहूं ते लोग अभागी - हरि तजि होयँ विषय अनुरागीं ।
इन्द्रिय लोलुप जे जग माँही, विषय भोग पर प्रीति सदाई ॥
६१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
इतने बांध बांधने पर भी ये राग-द्वेष रूपी प्रबल शत्रु किसी
को छोड़ते कहाँ हैं ? सामान्य जन की तो बात क्या, पैदा होते
ही इन दोनों ने ब्रह्मा जी पर धावा बोल दिया-विधाता पर
आक्रमण करने का यहाँ विशेष भाव है-“विधानं विधिः” ब्रह्मा
जी कानून के रूप हैं। संसार के जीने के लिए तथा जीवन को
सफल बनाने के लिए शास्त्रों ने विधान बनाया है। “रामवद्
वर्तितव्यम् न रावणादिवत्” राम की तरह आचरण करना चाहिये
रावण की तरह नहीं-यह विधान है, किन्तु राग-द्वेष हृदय में आते
ही विधान का भक्षण करने लगते हैं; कितना सुन्दर संकेत है ?
जज अपने सम्बन्धी को दण्डित नहीं कर पाता, चाहे वह सम्बन्धी
रिश्वत से ही बना हो, बड़ा व्यावहारिक है। यहाँ तक देखा
जाता है कि जिसके प्रति राग होता है वही ईमानदार और सद्गुणी
दिखाई देता है। जैसे अभी एक पुत्र ने किसी लड़की में आसक्ति
के कारण पिता की हत्या कर दी; एक पत्नी ने अपने पति की
हत्या कर दी और दोनों बच गये कानून से; तब कहाँ रहा
शास्त्र और माता-पिता तथा गुरु जनों का उपदेश ? अब समझ
लीजिए यही ब्रह्मा जी, विधान और वेद का संकेत वेद-निर्माता
ब्रह्मा जी हैं। जब शास्त्र के विधान का लोप होने लगता है,
संकट की घड़ी आती है, तभी भगवान् की याद आती है। यदि
जीवन में संकट न आवे तो कथञ्चित् भगवान् की भी याद
न आवे-
दुखों से अगर चोट खाई न होती, तेरी प्रभो ! याद आई न होती।
यही कारण है भगवान् के प्यारे भक्त यही कामना करते हैं-
सुख के माथे सिल परे, नाम हृदय ते जाय।
बलिहारी वा दुःख की, पल-पल नाम रटाय ॥
भगवान् विष्णु के शयन का भाव यह है कि शेष शब्द
अनन्तवाची है। सब कुछ प्रलय होने पर भी जो शेष रहे, वही
अधिष्ठान-तत्व शेषशायी सर्वत्र व्याप्त परमात्मा है, जिनका
अनुभव योगी जन गुणों से परे होने पर सात्विक वातावरण में
मी जागता है, जगत् जागता है तो संयमी सोता
है । भाव यह है कि दुनियाँ भगवान् से सोई हुई है और नाशवान्
में जगी हुई है ।
दूसरी बात यह है कि व्यवहार काल में जैसे तत्वज्ञ महा-
पुरुष भी अविद्या में आकर ही व्यवहार करता है-हँसने रोने
की लीला संसारी लोगों के कल्याण के लिए करता है-लोक -
संग्रह के लिए यह लीला बन्धन कारक नहीं होती-
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्म फले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति, कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १/१४ ॥
निष्क्रिय ब्रह्म रावण एवं कंस का संहार नहीं कर सकता,
उसे भी माया शक्ति के द्वारा श्री राम या श्री कृष्ण वेश में आना
पड़ता है । ऐसे यहाँ जब ब्रह्मा जी पर संकट देखा तो उनके
लिए करुणा करके महामाया का आश्रय लेकर विष्णु भगवान्
भी जागे और लड़ने लगे । प्रत्येक मानव शक्ति-पुञ्ज है, अपार
शक्ति-आगार है । मनुष्य एवरेस्ट पर विजयी बना । चंद्रलोक
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६३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
को प्राप्त कर सकता है । जिस शक्ति से राग-द्वेष के मधु-कैटभ
का वध कर सकता है ।
विष्णु भगवान् पाँच हजार वर्षों तक लड़ते रहे, किससे ?
अपने कर्णमैल से उत्पन्न हुए मधु कैटभ से-राग-द्वेष से । समझने
की बात है राग-द्वेष जिस अन्तःकरण से पैदा होते हैं उसी से
लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं उसकी शान्ति भंग कर देते हैं । यह
कितना अच्छा होगा कि दूसरों की निन्दा स्तुति का परित्याग
कर उतनी देर आत्म चिन्तन करें, स्वाध्याय करें अथवा जप
करे; जिससे अपना कल्याण हो और अन्तः करण से प्रसूत होने
वाले राग द्वेष का प्रसव (जन्म) ही न हो सके । तब न रहेगा
बाँस न बजेगी बाँसुरी । इसके विपरीत दूसरे का चिन्तन
करने से अन्तःकरण दूषित होता है और समय का दुरुपयोग
भी होता है, और छाती पर खड़े हो जाते हैं घोर यन्त्रणा देने
वाले काम-क्रोध, लोभ-मोह जैसे सेनापतियों सहित राग-द्वेष
जैसे अप्रतिम प्रबल बलशाली शत्रु ।
पाँच हजार वर्षों में प्रथम 'पाँच' शब्द संख्या वाची है ।
पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; पंच महाभूत, पञ्च-
तन्मात्रायें अथवा प्रपञ्चों में ही जोड़ लिया जाय, तब इन सब
के संघात से जीव देह धारण करता है, और जब तक जीव
इन प्रपञ्चों से जुड़ा रहता है तब तक अन्त वाला होते हुए भी
अनन्तकाल तकभटकता रहता है; क्योंकि अन्ते या मतिः सा गतिः
अर्थात् अन्तकाल में इस प्रपञ्च की जिस वस्तु या व्यक्ति की
याद आयेगी आगे का जीवन उसी के अनुसार होगा । इस बात
का प्रत्यक्ष प्रमाण है जड़ भरत का जीवन, जिन्हें मृग शावक
की वासना से मृग-योनि में पैदा होना पड़ा ।
श्रीमद्भागवत महापुराण में पुरञ्जन की कथा भी इस बात
की पुष्टि करती है कि पुरञ्जन को अन्तिम समय में
पुरञ्जनी के चिन्तन के कारण अगले जन्म में नारी शरीर धारण
करना पड़ा ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६४
पुराणों में संख्या का भाव अनन्त अर्थ में ग्रहण किया
जाता है । अन्तमयी सृष्टि का अन्त भी अनन्त में होता है और
सृजन भी ! आपने देखा कि पाँच तत्वों का संयोग पाते ही
अनन्त जीव अनन्त ईश्वर का अंश अन्त वाला-नाशवान बन
गया, और यूं जन्म-मरण के आवागमन चक्र में भटकने लगा,
जिसका मूल कारण बन गया राग-द्वेष ।
अब प्रश्न उठता है इस राग-द्वेष का नाश कैसे हो ?
यद्यपि आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय तथा जप का संकेत अभी दिया
था फिर भी राग-द्वेष की संक्रामक व्याधि का उपचार इनके
उलटने में ही है । संसार के राग को उलट कर अनन्त
(भगवान्) से अनुराग कीजिए :-
मिलहि न रघुपति बिन अनुरागा, किये कोटि जप जोग विरागा ।
मम दर्शन फल परम अनूपा, जीव पाय निज सहज स्वरूपा ॥
बिना अनुराग के परमात्मा नहीं मिलते हैं । अनुराग
हृदय की सहज वृत्ति है, केवल उसकी दिशा परिवर्तित करनी
है । जहाँ-जहाँ मन जाता है वहीं-वहीं परमात्मा का दर्शन
कीजिए । 'परमात्मा का दर्शन' कैसे करें-इस पर विचार
कीजिए कि जहाँ मन जाता है वहाँ परमात्मा का अस्तित्व है
या नहीं, तब मालूम पड़ेगा कि परमात्मा के अस्तित्व के बिना
कोई पदार्थ, वस्तु या व्यक्ति रह नहीं सकता ।
माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि या अन्यों के साथ जो भी
व्यवहार होता है वस्तुतः परमात्मा के ही साथ होता है, क्योंकि
परमात्मा से सम्बन्ध छूटते ही सब अस्पृश्य हो जाते हैं ।
अतः स्वतः सिद्ध हो रहा है, हमारे समस्त व्यवहार परमात्मा
से ही हो रहे हैं । इस सत्य को न समझने के कारण ही हम
ब्राह्य आकार को ही प्रेम या द्वेष का अधिष्ठान समझे हुए हैं ।
वृहदारण्यक उपनिषद् में यह बात बहुत स्पष्ट रूप में
वर्णित है कि परमात्मा के मूर्त और अमूर्त रूप को समझने
६५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
के लिए मूर्त रूप का सहारा लिया जाता है। उदाहरणार्थ अमूर्त
गन्ध को समझने के लिए मूर्त पुष्प का आश्रय लिया। हम जिसे
भी गले लगाते हैं, छाती से चिपकाते हैं तभी तक, जब तक उसमें
चैतन्य विराजमान है। जहाँ मालूम हुआ कि इसमें अब चैतन्य
नहीं है उसी क्षण हटा देते हैं, चाहे कितना भी अनन्य सगा -
सम्बन्धी क्यों न हो। इससे सिद्ध है कि हम सब न दीखने वाले
भगवान् से ही प्रेम करते हैं दीखने वाले वाह्य आकार से नहीं।
समस्त व्यवहार परमात्मा से ही हो रहे हैं, ऐसा तात्विक
बोध होने पर व्यक्ति को सुख-दुःख की स्थिति भी विचलित नहीं
कर सकती। साधक और भक्त प्रारब्ध से कदापि सुख की
कल्पना नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि जरा सी धड़कन बन्द
होते ही सुख के साधन पड़े ही रह जायेंगे। अतः वे दुःख को
अपने कर्मों का फल और सुख को परमात्मा की कृपा ही मानते
हैं। दूसरे सुख की आशा करना ही मधु है-राग है और दूसरे से
दुःख की आशा करना कैटभ है-
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६६
सर्वोपरि समझनी चाहिए क्योंकि जो राग-द्वेषादि संसारी जनों
के प्रति घातक हैं वही परमात्मा के प्रति समर्पण से साधना है ।
भगवान् के चरणों में ही मधु-कैटभ का वध हुआ है । कितना
सुन्दर संकेत है कि इन दोनों राग-द्वेष का नाश प्रभु के चरणों
में ही होता है ।
सुदर्शन चक्र का भाव भी स्वदर्शन, आत्मबोध है । आत्म-
बोध होने से दोषों से सर्वथा मुक्ति मिल जाती है, क्योंकि
उस आत्मवान् का कोई अपना-पराया नहीं होता है, जब दूसरे
की प्रतीति ही नहीं, तो राग-द्वेष होगा किससे ?
निर्द्वन्द्वो नित्य सत्त्वस्थो निर्योग क्षेम आत्मवान् । गीता ।
आत्म-निष्ठ में निर्द्वन्द्वता, निश्चिन्तता सहज आ जाती
है ‘कोई गैर नहीं कोई और नहीं’, इस निश्चय से जीवन सरस
होता है, क्योंकि राग होने पर विषयों का चिन्तन, चिन्तन से
मिलन की कामना (इच्छा) उदय होती है । कामना-पूर्ति से
लोभ और मोह तथा काम-पूर्ति न होने पर क्रोध, तथा क्रोध से
मोह तत्पश्चात् बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है; विनाश के लक्षण हो
जाते हैं ।
इस संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के आसक्ति-वंश-वृक्ष
विकास का अवलोकन-मनन आवश्यक ही नहीं वरन् वरणीय
है । अतः देखिये :—
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति । गी २/६२
अतः प्रबल शत्रु राग-द्वेष ही हैं इन्हीं से काम-क्रोधादि
प्रकट होते हैं :
काम एष क्रोध एष रजो गुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥गी० ३/३७।
६७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
रजोगुण से उत्पन्न हुये इन दुष्टों को (काम-क्रोध)
महापापी शत्रु समझना चाहिये।
इहैव तैर्जित, सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। गी० ५/१६
शक्नोतीहैव सोढुं प्राक् शरीर विमोक्षणात्
काम-क्रोधोद्भवं वेगं सः मुक्तः सः सुखी नरः॥ ५/५३
शरीर त्याग से पूर्व ही जिन साधकों में इन दुष्टों को
(शत्रुओं) को जीत लिया है, वे ही सुखी हैं, सम हैं तथा
योगी हैं।
इस प्रकार प्रथम चरित्र में भगवद्गीता के उपदेशानुसार
ही राग-द्वेष-मधु कैटभ से निवृत्ति आख्यान के द्वारा समझाई
गई है, और जीवन के विविध व्यावहारिक पक्षों को सुधारने का
संदेश दिया है। समाधि सहित राजा सुरथ ने इस सदुपदेश को
सुना और वे बहुत प्रसन्न हुए।
यही फल श्रुति है :-
काम-क्रोध वियुक्तानां, यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्म निर्वाणं, वर्तते विदितात्मनाम् ॥ गीता५/२६
अर्थात् राग-द्वेष से उत्पन्न होने वाले काम-क्रोध से रहित
होकर योगी परम शान्ति या परम प्रसन्नता का अनुभव करते
हैं, क्योंकि राग-द्वेष से ही राहु और केतु की तरह सूर्य (बुद्धि)
और चन्द्रमा (मन) को ग्रहण करते रहते हैं। एक में सिर है,
विचार तो कर सकता है, किन्तु धड़ न होने से कुछ कर्म नहीं
कर सकता; दूसरे में केवल धड़ है वह विचार नहीं कर सकता है।
यही स्थिति दोनों भाइयों मधु-कैटभ (राग-द्वेष) की यहाँ दिखाई
गई है, जब तक ये नष्ट नहीं होते, जीव को भटकाते ही रहते
हैं। अतः इनसे मुक्ति के लिए माँ पराम्बा भगवती के चरणों में
समर्पित होना चाहिए। जोवन का प्रथम भाग शैशव का होता
है, जो सर्वथा राग-द्वेष रहित होता है। इसो कारण बालक
सबको प्रिय होता है। साधक को विशेषतः करुणामयी माँ के
श्रो दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६८
भक्त को अपना जीवन निष्छल प्रेममय बनाना चाहिए तभी तो
प्रेम-नगर में स्थान मिलेगा ।
आइए हम सब प्रेम से मिलकर गाये—
प्रेम नगर में जाना है ।
जो शीश तली पर धर न सके, वह प्रेम गली में आये क्यों ?
जिसे प्रेम नगर में जाना है, वह जग में चित्त भरमाये क्यों ?
तुझे काम-क्रोध से बचना है, यह माया की सब रचना है ।
जो मन विषयों से मोड़े नहीं, वह भक्ति का ढोंग रचाये क्यों ?
जो प्रेम नगर में रहते हैं, उन्हें लोग बावरा कहते हैं ।
जो ताने जग के सह न सके, वह प्रोतम से नैन मिलाये क्यों ?
जो प्रकाश प्रेम का पा न सके, वह इष्टदेव अपनाएँ क्यों ?
६६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मध्यम चरित्र
द्वितीयोऽध्यायः
द्वितीय-चरित्र-प्रथम चरित्र की भाँति द्वितीय चरित्र भी
आख्यान द्वारा प्रतिपादित किया गया है। श्रोता की श्रद्धा से
द्रवित होक बिना पूछे ही आगे का वर्णन किया गया है; यही
गुरु-कृपा है-शास्त्र-संकेत है-
ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवोः दीन वत्सलाः ।
दीन वत्सल गुरुजनों को स्नेही शिष्यों के लिए तात्विक
उपदेश कहना हो चाहिए। क्योंकि-
गूढ़ तत्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जँहा पावहि ।
इस सिद्धान्त से इसमें गुरु की अहेतु की कृपा ही कारण
है ।
मध्यम चरित्र के द्वितीय अध्याय की कथा से पूर्व माँ का
ध्यान, और इसके विनियोग पर विचार कर लेना आवश्यक है ।
‘ध्यान-विनियोग-कथा’
ध्यानम्
ॐ अक्षस्रक् परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकाम्,
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टा सुरा भाजनम् ।
शूलं पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननाम्;
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोज स्थिताम् ॥
कमलासन पर विराजमान, प्रसन्न मुख मुद्रा से सुशोभित,
महिषासुर-मर्दिनी, भगवती महालक्ष्मी माँ को मैं प्रणाम करता
हूँ, जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, धनुष,
कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शङ्ख, घण्टा, मधु पात्र, शूल,
पाश और चक्र धारण करती है ।
विनियोग
ॐ मध्यम चरित्रस्य विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता,
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७०
उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्वम्,
यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्री महालक्ष्मी प्रीत्यर्थं मध्यम चरित्र जपे
विनियोगः ।
इस चरित्र के ऋषि विष्णु हैं, जैसे ब्रह्मा जी सृष्टि के
रचयिता हैं, वैसे ही श्रीविष्णु भगवान् सृष्टि के पोषण कर्ता हैं।
ब्रह्मा जी वेद-शास्त्र के प्रवर्त्तक हैं। जब समाज में वेद-शास्त्र
पर घात होता है तब वह पालनीय शक्ति कैसे रक्षा करती है ?
इस बात को आप भली भाँति सुन चुके हैं। जब समाज में
उदण्ड, उच्छृंखल, स्वेच्छाचारी दुष्टों का साम्राज्य बढ़ने लगता
है, दैवी गुणों का ह्रास होने लगता है; तब किस प्रकार वह
पालन-पोषणीया शक्ति समाज की रक्षा करती हैं यह कथा अब
सुनाई जायेगी। इस चरित्र के देवता भगवान् की इच्छा शक्ति
महालक्ष्मी हैं लक्ष्मी शब्द के कई अर्थ होने हैं—श्री, विजय,
विभूति (ऐश्वर्य), दीप्ति, कान्ति, नीति, शोभा। जीवन में ये
सभी चीजें प्रत्येक के लिए आवश्यक है। ये कैसे मिले ? इस
युक्ति को इस चरित्र में समझाया गया है। इसमें उष्णिक् छन्द
है, शाकम्भरी शक्ति है। इसमें भक्तों को याद दिलाई गई
है कि जब समाज में घोर दैत्यों का साम्राज्य आ गया था, तो
पराम्बा ने किस प्रकार शाकम्भरी का वेश धारण कर उनका
संहार किया था। यह कथा आप देवी भागवत में पढ़ें। यहाँ
केवल उनकी करुणा के लिए संकेत है।
सम्पूर्ण दुर्ग (क्लेशों) को नष्ट करने वाली माँ दुर्गा
इसका बीज है, वायु तत्व है और यजुर्वेद इसका स्वरूप है इन
सबका स्मरण कर—नाम लेकर हम उनके प्रति कृतज्ञ होते हैं;
और उन्हें नमस्कार करते हैं। जिन्होंने हमें यह चरित्र प्रदान
किया है। इन भगवती के चरणों में प्रणत होकर महर्षि मेधा
जी कहते हैं :—
७१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
एक बार देवासुर संग्राम में देवता लोग हार गये । तभो
सभी देवता ब्रह्मा जी को साथ लेकर भगवान् विष्णु और
शिवजी के पास गये और विस्तार से अपनी व्यथा सुनाई ।
यह सुनकर दोनों देवों ने क्रोध व्यक्त किया, जिससे विष्णु जी के
मुख से एक महान् दिव्य तेज प्रकट हुआ । इसी प्रकार ब्रह्मा जी,
शंकर जी, इन्द्र, वरुणादि देवताओं के शरीरों से भी एक-एक
तेज निकला और वे सब तेज मिलकर जाज्वल्यमान पर्वत सा
एक तेजपुञ्ज रूप में देवताओं को दिखाई दिया । फिर वही
विशाल तेज-पुञ्ज एक नारी के रूप में परिणत हो गया ।
शिवजी के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से
देवी के सिर के केश, विष्णु तेज से उनकी भुजायें, चन्द्र तेज से
दोनों स्तन, इन्द्र तेज से कटि, वरुण तेज से जङ्घा, पृथ्वी तेज से
नितम्ब, ब्रह्मा तेज से चरण, सूर्य तेज से अंगुलियाँ, वसुओं के
तेज से हाथ की अंगुलियाँ, कुबेर के तेज से नासिका, प्रजापति
के तेज से दाँत, अग्नि के तेज से त्रिनेत्र, सन्ध्या भृकुटि और
वायु के तेज से कान प्रकट हो गये । फिर उस महाशक्ति को
सभी देवताओं ने अपने-अपने विशेष आयुद्ध एवं आभूषण प्रदान
किये । अब देवीजी समस्त आयुधों और आभूषणों से युक्त हो
गई । तब क्षीर-सागर ने भी दिव्य हार, दो दिव्य वस्त्र,
चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्द्ध चन्द्र, बाजूबन्द, नूपुर,
गले की हँसली और रत्न जटित अंगूठियाँ प्रदान की ।
विश्वकर्मा ने फरसा और कवच दिया और सुन्दर कमलों
की माला पहनाई । उसी समय पर्वतराज हिमालय ने उन्हें
अपरिमित रत्न और सवारी के लिए सिंह प्रदान किया । अब
सुसज्जित होकर उस महाशक्ति ने ऐसा अट्टहास किया, जिससे
आकाश निनादित हो उठा, ब्रह्माण्ड काँप उठे, धरा डोलने लगी
और देवता प्रसन्न होकर जय-जयकार करने लगे ।
युद्ध की ललकार सुनकर दैत्यराज महीषासुर अपने बलिष्ठ
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७२
चिक्षुर, चामर, दुर्मुख, दुर्धर्ष आदि प्रमुख सेनापतियों तथा
असंख्य वीरों की सेना सहित सुसज्जित होकर युद्ध के लिए
गर्जना करता हुआ सामने उपस्थित हो गया। बड़ा भयंकर लोम-
हर्षक युद्ध हुआ। दानवी सेना की अपरिमितता देख पराम्बा
भगवती ने अपनी श्वासों से असंख्य गण पैदा कर दिये। जिन्होंने
समरांगण में दैत्यों की सेना को ध्वंस कर दिया। युद्ध के अन्त
में महिषासुर की सब सेना नष्ट हो गई। देवता बड़े प्रसन्न होकर
माँ भगवती पराम्बा पर पुष्प-वर्षा करने लगे।
उद्धार करो जगदम्बे, तुम्हारी शरण पड़े।
भव पार करो माँ जगदम्बे, तुम्हारी शरण पड़े।
कैसे तेरा नाम रटाये, कैसे तुमसे लगन लगाये
हृदय जगा दो ज्ञान, तुम्हारी शरण पड़े।
ऐसी अंतर ज्योति जगाना, हम दीनन को शरण लगाना
हे करुणाकारिणी माँ जगदम्बे, तुम्हारी शरण पड़े ।
अब इस कथा पर विचार करना समीचीन है। हमारे
अन्तःकरण में सत्य, क्षमा, करुणा, उदारता आदि दैवी गुण सहज
विद्यमान है, किन्तु विषयों के चिन्तन से उन विषयों में राग-द्वेष,
काम-क्रोध, लोभ-मोह आ जाते हैं। यह बात आप पहले अध्याय
में सुन चुके हैं कि दैवी गुण हमारे भीतर सहज ही हैं किन्तु
आसुरी भाव बाहर से आते हैं। आसुरी भावों का यह लक्षण है
कि वे दैवी गुणों पर आक्रमण कर सारे शरीर पर अपना
आधिपत्य जमा लेते हैं। यह बात दैनिक व्यवहार में अनुभूत
है। हमारी इन्द्रियों में अलग-अलग देवता विराजमान हैं। जैसे
बुद्धि के देवता ब्रह्मा जी, मन के चन्द्रमा, चित्त के वासुदेव,
अहंकार के रुद्र, नासिका के अश्विनी कुमार, आँखों के सूर्य, मुख
के अग्निदेव, जिह्वा के वरुणदेव, कान के दिग्देवता, पैर के
विष्णु, हाथ के इन्द्र, मूत्रेन्द्रिय के प्रजापति और गुदेन्द्रिय के
यमराज हैं। ये देवता अपनी-अपनी इन्द्रियों में समाविष्ट होकर
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उनका पालन करते रहते हैं । यही अधि-देवमण्डल उनका
संचालक भी है ।
वस्तु का बोध आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधि-
दैविक तीनों प्रकार से होता है । जैसे हमारे सामने रखा हुआ
एक कमल का पुष्प आधिभौतिक है; क्योंकि उसकी गन्ध पृथ्वी
नासिका के द्वारा ग्रहण की जाती है, स्वाद—जल-जिह्वा द्वारा
आस्वादित होता है । तेज उसका रंग सूर्य तत्व आंखों से ग्राह्य
होता है, उसका स्पर्श वायु-तत्व त्वचा से अनुभूत किया जाता
है और शब्द आकाश तत्व जो कान से श्रवण किया जाता है ।
इस प्रकार आपने देखा कि एक फूल में पाँचों महाभूत है और
उन पाँचों को ग्रहण करने के लिए अलग-अलग इन्द्रियाँ हैं, वे
इन्द्रियाँ ही आध्यात्मिक कहलाती हैं । अब इन आध्यात्मिक
इन्द्रियों से आधिदेवताओं की सहायता से आधिभौतिक (दैहिक)
वस्तुओं को ग्रहण किया जाता है । प्रत्येक वस्तु के ग्रहण करने
की यही विधि हैं, किन्तु इन तीनों में चैतन्य पुरुष एक है—
योऽध्यात्मिको पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।
यस्तत्रोभय विच्छेद पुरुषो ह्याधिभौतिकः ।
श्रीमद् भाग०/२/१०/८
अर्थात् आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तीनों में
चैतन्य एक है । तीनों मिलकर ही ज्ञान है । जब आँख फूल को
देखना चाहती है, तो आँख के देवता (सूर्य) प्रकाश देखकर फूल
का ज्ञान करा देते हैं । यह सामान्य क्रम चलता रहता है । जब
सभी इन्द्रियों के द्वारा या किसी एक भी इन्द्रिय के द्वारा शास्त्र
विरुद्ध आचरण होने लगता है तो यह देव मण्डल आसुरी वृत्ति
से-दूषित भावों से त्रस्त हो जाता है और इन्द्रियों के पालन में
असमर्थ हो जाता है । इसलिए जीवन में शास्त्रानुसार सदाचार,
शुभ आचरण और सत्कर्म आवश्यक है । जब इन्द्रियों पर आसुरी
भाव आ जाते हैं, तब दैवी शक्ति समाप्त होने लगती है । इसका
प्रबल प्रमाण रावण था जिसने तप के द्वारा अनेक दैविक शक्तियों
के वरदान प्राप्त किये थे किन्तु उसके दुराचारी हो जाने पर
सभी शक्तियाँ वापिस चली गई और श्रीराम के साथ युद्ध में
वे समस्त शक्तियाँ निष्फल हो गई थीं ।
यह अन्तःकरण का भाव-युद्ध आत्म निरीक्षण से ही ज्ञात
होता है अन्यथा व्यक्ति प्रायः दूसरों के युद्ध तथा दूसरों के दोषों को
देखना चाहता है । जब दैवी गुणों का ह्रास होता है, तब भगवान्
की शरण ग्रहण की जाती है; काम-क्रोध आदि विकार आते ही
सारे शरीर को प्रभावित करते हैं । सत्संग तथा कण्ठस्थ की गई
गीता-रामायण उस समय काम नहीं आती है; यही आसुरी
प्रबलता का दृष्टान्त है ।
इस प्रसङ्ग में महिषासुर अस्मिता अभिमान का रूप है ।
अहङ्कार-पद, रूप, धन, विद्या, बल तथा अधिकार का होता है,
जो हजारों सद्गुणों को दबाने वाला होता है, सहसा आई बाढ़
की तरह ध्वंस लीला करता है-तभी तो समस्त देवों को परास्त
कर महिषासुर स्वयं इन्द्र बन बैठा । अहंकार सभी दैवी गुणों
को पराभूत कर स्वयं ऐश्वर्य मद-ग्रस्त हो जाता है । तब हमारी
इन्द्रियों में बैठे देवता इन्द्रियों से अशास्त्रीय मनमाने अभद्र
व्यवहार देखकर पलायन कर जाते हैं । साधक वही है जो ऐसी
अवस्था में आत्म निरीक्षण कर सके ।
अब सभी देवताओं ने एकत्रित होकर अपने-अपने तेज
मिलाकर एक महाशक्ति प्रकट की । उसे सभी देवों ने आयुधों
तथा आभूषणों से अलंकृत किया, जिसने अपने श्वासों के द्वारा
सृजित गणों के द्वारा पहले महिषासुर के सैन्य बल को नष्ट
किया । इसका अर्थ हमें 'संघ शक्ति' के सूत्र से चिर स्मरण कराये
रखना है । घर परिवार से लेकर विश्व के विशाल रंगमंच तक
संगठन-शक्ति का अपना महत्वपूर्ण स्थान है । अनेक दुर्बल
मिलकर असम्भव को सम्भव कर दिखाते हैं । कपोतराज चित्र
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ग्रीव की कथा में दोनों ही तथ्य विद्यमान हैं।
एक बार कपोतराज सपरिवार गगन से उड़ता हुआ
देशान्तर जा रहा था। वन के मार्ग में व्याध के द्वारा तण्डुल
विकीर्ण करके जाल बिछाया गया था। जिह्वा की लोलुपता
और भूख की व्याकुलता से पारिवारिक कपोतराज के बार-बार
मना करने पर भी उन चावलों के दानों पर टूट पड़े और जाल
में बंध कर पश्चाताप करते हुए एक दूसरे को दोषारोपित करने
लगे। पुन' कपोतराज ने समझाया, अब दूसरी भूल करके अपने
प्राणों को सङ्कट में मत डालो। सब एक साथ जोर लगा कर
उड़ चलो, फिर क्या था वृद्ध के अनुशासन और उनकी प्रेरणा
से जाल सहित उड़ चले। कपोतराज उन सबको अपने मित्र
हिरण्यक मूषकराज के पास ले गया। जहाँ उसके जाल काटने
पर वे सब मुक्त हुए।
इस आख्यायिका में बिना खेतों के निर्जन वन में चावलों
का होना भय की आशंका का द्योतक है, कपोतराज-गुरु के
उपदेश को अनसुना करने का फल सब का बंध जाना है।
इन्द्रिय-दासता और अशास्त्रीय व्यवहार का दुष्परिणाम मृत्यु
को निमंत्रण है। गुरु की करुणा से तथा स्वयं संगठन से ही
पुनर्जीवन प्राप्ति सम्भव है। कोमल कमल बाल के विसन्तु तथा
जीर्ण शीर्ण घास को बँट कर रस्सी बना लेने पर मदोन्मत्त हाथी
को बांध लिया जाता है। 'संघ में शक्ति' का इससे बढ़कर दूसरा
दृष्टान्त क्या हो सकता है ? आप लोग तो सब परिचित ही हैं
कि भारतीयों ने संघ शक्ति से ही स्वतन्त्रता प्राप्त की थी।
फिर भी न जाने क्यों ? हम अपनी इन्द्रियों को शक्तियों को
यों ही व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं, जिसे सञ्चित करके महान् शक्ति
अर्जित की जा सकती है। प्राचीन महर्षियों में यही विशेषता थी।
यहीं बैठे स्वर्ग की बातें जान लेते थे। महर्षि वशिष्ठ जी ने दिलीप
से कहा-"स्वर्ग की कामधेनु का तुम से अपमान हो गया है, जिसके
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कारण पुत्र नहीं हुआ है; अतः नन्दिनी की सेवा करो ।" यह
जादू मन की सङ्कल्प शक्ति का है । मन में बहुत शक्ति है किन्तु
व्यर्थ-चिन्तन से नष्ट होतो रहती है ।
ऐसे ही प्रत्येक इन्द्रियों में शक्ति है, उसे बचाओ, सुरक्षित
रक्खो, समय पर वही महाशक्ति का काम दे सकती है और
अहंकार की सारी कुप्रवृत्तियाँ नष्ट कर सकती हैं । 'समस्त सेना
ध्वंस कर डाली गई ।' महाशक्ति के निश्वास से निकले हुए गण
ही तो देवी जी की सेना बन गये । उन्होंने ही महिषासुर की
सेना का संहार किया-
निश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ।
त एव सद्य सम्भूता गणाः शत सहस्रशः ॥२/५२-५३
यही गण मन की संकल्प शक्ति से प्रकट होते हैं । दृढ़
संकल्प में बहुत शक्ति होती है । शुक्ल यजुर्वेद के प्रथम अध्याय
में 'शिव-संकल्पमस्तु' के छः मंत्र हैं । उन्हें ध्यान से पढ़ने पर
मन का रहस्य व्यक्त हो जाता है । जब सारी सेना नष्ट हो
जाती है; तब राजा भी अकेला लड़ने में असमर्थ हो जाता है ।
हमारे आसुरी भावों में जो कुप्रवृत्तियाँ उपद्रव करती हैं, उन्हें
ईश्वराराधन, दृढ़ वैराग्य, भक्तिभाव की पराकाष्ठा और दृढ़
संकल्प के द्वारा नष्ट किया जा सकता है । यही द्वितीय अध्याय
का सारांश है ।
'शुभं - भूयात्'
हे मात भवानी जग जननी, संकट हरणी मन भरने दो ।
हम सब माँ तेरे बालक हैं, हमें चरण तले निज रहने दो ॥
देव पड़े जब विपदा में, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गर्जी, फिर रूप वही दरसाने दो ॥
उत्तर चरित्र: शुम्भ-निशुम्भ वध एवं महासरस्वती चरित्र (अध्याय ५-१३)
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तृतीयोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ उद्यद्भानुसहस्र कान्तिमरुण क्षौमां शिरोमालिकाम्,
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्द श्रियं,
देवीं बद्धहिमांशु रत्नमुकुटां वन्देऽरविन्द स्थिताम् ।
उदयकालीन सहस्रों सूर्य की कान्ति के समान श्री अङ्गों
से कान्तिमान, रक्तिम वर्ण, रेशमी साड़ी से सुशोभित, गले में
मुण्डों की माला से अलंकृत, लाल रंग के चन्दन से चर्चितस्तन
शोभिता, कमल रूपी करों में जप माला, विद्या, अभय तथा वर
मुद्रा धारण किए हुए तीन नेत्रों से कमल मुख की शोभा वर्द्धिता,
मस्तक पर चन्द्रमा सहित मणि माणिक्यादि रत्न-जटित-मुकुट
धारिता, कमलासन विराजिता माँ जगम्दबे को मैं प्रणाम करता
हूँ ।
महात्मा मेधा ऋषि ने पराम्बा को प्रणाम करके कहा—
हे राजन् ! महिषासुर की सेना के समाप्त होने के पश्चात् सेना-
नायक क्रमशः माँ से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े । ‘दम्भाहंकार
संयुक्ता’ की उक्ति के अनुसार अपने को बहुत बड़ा वीर समझ कर
लड़ने लगे । माँ ने चिक्षुर का संहार किया । चामर को सिंह ने
मार दिया । दुर्मुख और दुर्धर्ष भी दोनों माँ की तीक्ष्ण कृपाण से
मारे गये । यह देखते ही अपने को असहाय सा समझ कर जोर-
जोर से गर्जता हुआ महिषासुर माँ के सामने अस्त्र-शस्त्र बरसाने
लगा ।
तब माँ ने कहा—
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ः, मधु यावत्पिबाम्यहम् ।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ ३/३८
अरे मूर्ख ! जब तक मैं मधुपान करती हूँ, तब तक क्षण भर