दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्”
हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं, जो चाहो, वरदान माँग लो ।
तब भगवान् ने कहा—‘भवेतामद्य मे तुष्ठौ मम वध्यावुभा-
वपि । किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम । ६८ । यदि तुम
लोग मुझसे प्रसन्न हो, तो मेरे हाथ से मारे जावो, यही वरदान
दीजिए । यह सुनकर वे बोले—जहाँ पृथिवी पर जल की बूँदें न
हों न सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो । भगवान् कमल नयन
ने ‘तथास्तु’ कहकर विराट स्वरूप धारण कर दोनों के सिर
अपनी जङ्घाओं पर रख कर चक्र से काट डाले । इस प्रकार वह
महामाया ब्रह्माजी की स्तुति से प्रकट हुई थी ।
कथा पर विचार करने से स्पष्ट भाव प्रकट होता है कि
सर्वत्र व्याप्त परमात्मा विष्णु भगवान् हैं समस्त दिशायें उनके कान
हैं । भागवत् में कहा है—इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्रः कर्णौ दिशः
श्रोत्रममुष्य शब्दः । २/१/२६ इसी से भक्त उन्हें कहीं से भी
पुकारें; वे तुरन्त सुन लेते हैं । “चींटी के पर नूपुर बाजे वह भो
साहब सुनता है ।” यह प्रसिद्ध उक्ति है । आत्मशंसा एवं परनिन्दा
सुनना इन दिशाओं रूपी कानों का मैल है । यही दोनों मधु
और कैटभ हैं, दोनों का अर्थ एक ही है । जिन लोगों को दूसरे
की निन्दा करने सुनने में रस आता है, मिठास आता है—यही
मधु-मीठा राग है—सुन-सुन कर पैदा होने वाले दोनों दैत्य हैं—
‘रज्यतेऽनेनेति रागः । पाणिनिजी का सूत्र है तेन रक्तं रागात्’
जिससे चित्त-हृदय रङ्गीन हो जाता हैं वही राग है । आजकल
स्कूल कालेजों में बालक बालिकायें परस्पर एक दूसरे की
क्षणिक विशेषतायें सुनकर परस्पर मुग्ध हो जाते हैं । माता-
पिता शास्त्र का विधान अलग कर देते हैं । यह प्रेम नहीं राग
है, मीठी जंजीर है-बाँधने वाली है । जो लोग कान के कच्चे
होते हैं उनको तो यह राग पैदा करते देर नही लगती । इसी
प्रकार द्वेष है—‘द्विगुणितं विषमितिद्वेषः’ दूना जहर है ।