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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 156 में से

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पृष्ठ 96

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७२
चिक्षुर, चामर, दुर्मुख, दुर्धर्ष आदि प्रमुख सेनापतियों तथा
असंख्य वीरों की सेना सहित सुसज्जित होकर युद्ध के लिए
गर्जना करता हुआ सामने उपस्थित हो गया। बड़ा भयंकर लोम-
हर्षक युद्ध हुआ। दानवी सेना की अपरिमितता देख पराम्बा
भगवती ने अपनी श्वासों से असंख्य गण पैदा कर दिये। जिन्होंने
समरांगण में दैत्यों की सेना को ध्वंस कर दिया। युद्ध के अन्त
में महिषासुर की सब सेना नष्ट हो गई। देवता बड़े प्रसन्न होकर
माँ भगवती पराम्बा पर पुष्प-वर्षा करने लगे।
उद्धार करो जगदम्बे, तुम्हारी शरण पड़े।
भव पार करो माँ जगदम्बे, तुम्हारी शरण पड़े।
कैसे तेरा नाम रटाये, कैसे तुमसे लगन लगाये
हृदय जगा दो ज्ञान, तुम्हारी शरण पड़े।
ऐसी अंतर ज्योति जगाना, हम दीनन को शरण लगाना
हे करुणाकारिणी माँ जगदम्बे, तुम्हारी शरण पड़े ।
अब इस कथा पर विचार करना समीचीन है। हमारे
अन्तःकरण में सत्य, क्षमा, करुणा, उदारता आदि दैवी गुण सहज
विद्यमान है, किन्तु विषयों के चिन्तन से उन विषयों में राग-द्वेष,
काम-क्रोध, लोभ-मोह आ जाते हैं। यह बात आप पहले अध्याय
में सुन चुके हैं कि दैवी गुण हमारे भीतर सहज ही हैं किन्तु
आसुरी भाव बाहर से आते हैं। आसुरी भावों का यह लक्षण है
कि वे दैवी गुणों पर आक्रमण कर सारे शरीर पर अपना
आधिपत्य जमा लेते हैं। यह बात दैनिक व्यवहार में अनुभूत
है। हमारी इन्द्रियों में अलग-अलग देवता विराजमान हैं। जैसे
बुद्धि के देवता ब्रह्मा जी, मन के चन्द्रमा, चित्त के वासुदेव,
अहंकार के रुद्र, नासिका के अश्विनी कुमार, आँखों के सूर्य, मुख
के अग्निदेव, जिह्वा के वरुणदेव, कान के दिग्देवता, पैर के
विष्णु, हाथ के इन्द्र, मूत्रेन्द्रिय के प्रजापति और गुदेन्द्रिय के
यमराज हैं। ये देवता अपनी-अपनी इन्द्रियों में समाविष्ट होकर