दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रबल प्रमाण रावण था जिसने तप के द्वारा अनेक दैविक शक्तियों
के वरदान प्राप्त किये थे किन्तु उसके दुराचारी हो जाने पर
सभी शक्तियाँ वापिस चली गई और श्रीराम के साथ युद्ध में
वे समस्त शक्तियाँ निष्फल हो गई थीं ।
यह अन्तःकरण का भाव-युद्ध आत्म निरीक्षण से ही ज्ञात
होता है अन्यथा व्यक्ति प्रायः दूसरों के युद्ध तथा दूसरों के दोषों को
देखना चाहता है । जब दैवी गुणों का ह्रास होता है, तब भगवान्
की शरण ग्रहण की जाती है; काम-क्रोध आदि विकार आते ही
सारे शरीर को प्रभावित करते हैं । सत्संग तथा कण्ठस्थ की गई
गीता-रामायण उस समय काम नहीं आती है; यही आसुरी
प्रबलता का दृष्टान्त है ।
इस प्रसङ्ग में महिषासुर अस्मिता अभिमान का रूप है ।
अहङ्कार-पद, रूप, धन, विद्या, बल तथा अधिकार का होता है,
जो हजारों सद्गुणों को दबाने वाला होता है, सहसा आई बाढ़
की तरह ध्वंस लीला करता है-तभी तो समस्त देवों को परास्त
कर महिषासुर स्वयं इन्द्र बन बैठा । अहंकार सभी दैवी गुणों
को पराभूत कर स्वयं ऐश्वर्य मद-ग्रस्त हो जाता है । तब हमारी
इन्द्रियों में बैठे देवता इन्द्रियों से अशास्त्रीय मनमाने अभद्र
व्यवहार देखकर पलायन कर जाते हैं । साधक वही है जो ऐसी
अवस्था में आत्म निरीक्षण कर सके ।
अब सभी देवताओं ने एकत्रित होकर अपने-अपने तेज
मिलाकर एक महाशक्ति प्रकट की । उसे सभी देवों ने आयुधों
तथा आभूषणों से अलंकृत किया, जिसने अपने श्वासों के द्वारा
सृजित गणों के द्वारा पहले महिषासुर के सैन्य बल को नष्ट
किया । इसका अर्थ हमें 'संघ शक्ति' के सूत्र से चिर स्मरण कराये
रखना है । घर परिवार से लेकर विश्व के विशाल रंगमंच तक
संगठन-शक्ति का अपना महत्वपूर्ण स्थान है । अनेक दुर्बल
मिलकर असम्भव को सम्भव कर दिखाते हैं । कपोतराज चित्र