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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 156 में से

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पृष्ठ 85

६१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
इतने बांध बांधने पर भी ये राग-द्वेष रूपी प्रबल शत्रु किसी
को छोड़ते कहाँ हैं ? सामान्य जन की तो बात क्या, पैदा होते
ही इन दोनों ने ब्रह्मा जी पर धावा बोल दिया-विधाता पर
आक्रमण करने का यहाँ विशेष भाव है-“विधानं विधिः” ब्रह्मा
जी कानून के रूप हैं। संसार के जीने के लिए तथा जीवन को
सफल बनाने के लिए शास्त्रों ने विधान बनाया है। “रामवद्
वर्तितव्यम् न रावणादिवत्” राम की तरह आचरण करना चाहिये
रावण की तरह नहीं-यह विधान है, किन्तु राग-द्वेष हृदय में आते
ही विधान का भक्षण करने लगते हैं; कितना सुन्दर संकेत है ?
जज अपने सम्बन्धी को दण्डित नहीं कर पाता, चाहे वह सम्बन्धी
रिश्वत से ही बना हो, बड़ा व्यावहारिक है। यहाँ तक देखा
जाता है कि जिसके प्रति राग होता है वही ईमानदार और सद्गुणी
दिखाई देता है। जैसे अभी एक पुत्र ने किसी लड़की में आसक्ति
के कारण पिता की हत्या कर दी; एक पत्नी ने अपने पति की
हत्या कर दी और दोनों बच गये कानून से; तब कहाँ रहा
शास्त्र और माता-पिता तथा गुरु जनों का उपदेश ? अब समझ
लीजिए यही ब्रह्मा जी, विधान और वेद का संकेत वेद-निर्माता
ब्रह्मा जी हैं। जब शास्त्र के विधान का लोप होने लगता है,
संकट की घड़ी आती है, तभी भगवान् की याद आती है। यदि
जीवन में संकट न आवे तो कथञ्चित् भगवान् की भी याद
न आवे-
दुखों से अगर चोट खाई न होती, तेरी प्रभो ! याद आई न होती।
यही कारण है भगवान् के प्यारे भक्त यही कामना करते हैं-
सुख के माथे सिल परे, नाम हृदय ते जाय।
बलिहारी वा दुःख की, पल-पल नाम रटाय ॥
भगवान् विष्णु के शयन का भाव यह है कि शेष शब्द
अनन्तवाची है। सब कुछ प्रलय होने पर भी जो शेष रहे, वही
अधिष्ठान-तत्व शेषशायी सर्वत्र व्याप्त परमात्मा है, जिनका
अनुभव योगी जन गुणों से परे होने पर सात्विक वातावरण में