दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
रजोगुण से उत्पन्न हुये इन दुष्टों को (काम-क्रोध)
महापापी शत्रु समझना चाहिये।
इहैव तैर्जित, सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। गी० ५/१६
शक्नोतीहैव सोढुं प्राक् शरीर विमोक्षणात्
काम-क्रोधोद्भवं वेगं सः मुक्तः सः सुखी नरः॥ ५/५३
शरीर त्याग से पूर्व ही जिन साधकों में इन दुष्टों को
(शत्रुओं) को जीत लिया है, वे ही सुखी हैं, सम हैं तथा
योगी हैं।
इस प्रकार प्रथम चरित्र में भगवद्गीता के उपदेशानुसार
ही राग-द्वेष-मधु कैटभ से निवृत्ति आख्यान के द्वारा समझाई
गई है, और जीवन के विविध व्यावहारिक पक्षों को सुधारने का
संदेश दिया है। समाधि सहित राजा सुरथ ने इस सदुपदेश को
सुना और वे बहुत प्रसन्न हुए।
यही फल श्रुति है :-
काम-क्रोध वियुक्तानां, यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्म निर्वाणं, वर्तते विदितात्मनाम् ॥ गीता५/२६
अर्थात् राग-द्वेष से उत्पन्न होने वाले काम-क्रोध से रहित
होकर योगी परम शान्ति या परम प्रसन्नता का अनुभव करते
हैं, क्योंकि राग-द्वेष से ही राहु और केतु की तरह सूर्य (बुद्धि)
और चन्द्रमा (मन) को ग्रहण करते रहते हैं। एक में सिर है,
विचार तो कर सकता है, किन्तु धड़ न होने से कुछ कर्म नहीं
कर सकता; दूसरे में केवल धड़ है वह विचार नहीं कर सकता है।
यही स्थिति दोनों भाइयों मधु-कैटभ (राग-द्वेष) की यहाँ दिखाई
गई है, जब तक ये नष्ट नहीं होते, जीव को भटकाते ही रहते
हैं। अतः इनसे मुक्ति के लिए माँ पराम्बा भगवती के चरणों में
समर्पित होना चाहिए। जोवन का प्रथम भाग शैशव का होता
है, जो सर्वथा राग-द्वेष रहित होता है। इसो कारण बालक
सबको प्रिय होता है। साधक को विशेषतः करुणामयी माँ के