दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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उनका पालन करते रहते हैं । यही अधि-देवमण्डल उनका
संचालक भी है ।
वस्तु का बोध आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधि-
दैविक तीनों प्रकार से होता है । जैसे हमारे सामने रखा हुआ
एक कमल का पुष्प आधिभौतिक है; क्योंकि उसकी गन्ध पृथ्वी
नासिका के द्वारा ग्रहण की जाती है, स्वाद—जल-जिह्वा द्वारा
आस्वादित होता है । तेज उसका रंग सूर्य तत्व आंखों से ग्राह्य
होता है, उसका स्पर्श वायु-तत्व त्वचा से अनुभूत किया जाता
है और शब्द आकाश तत्व जो कान से श्रवण किया जाता है ।
इस प्रकार आपने देखा कि एक फूल में पाँचों महाभूत है और
उन पाँचों को ग्रहण करने के लिए अलग-अलग इन्द्रियाँ हैं, वे
इन्द्रियाँ ही आध्यात्मिक कहलाती हैं । अब इन आध्यात्मिक
इन्द्रियों से आधिदेवताओं की सहायता से आधिभौतिक (दैहिक)
वस्तुओं को ग्रहण किया जाता है । प्रत्येक वस्तु के ग्रहण करने
की यही विधि हैं, किन्तु इन तीनों में चैतन्य पुरुष एक है—
योऽध्यात्मिको पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।
यस्तत्रोभय विच्छेद पुरुषो ह्याधिभौतिकः ।
श्रीमद् भाग०/२/१०/८
अर्थात् आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तीनों में
चैतन्य एक है । तीनों मिलकर ही ज्ञान है । जब आँख फूल को
देखना चाहती है, तो आँख के देवता (सूर्य) प्रकाश देखकर फूल
का ज्ञान करा देते हैं । यह सामान्य क्रम चलता रहता है । जब
सभी इन्द्रियों के द्वारा या किसी एक भी इन्द्रिय के द्वारा शास्त्र
विरुद्ध आचरण होने लगता है तो यह देव मण्डल आसुरी वृत्ति
से-दूषित भावों से त्रस्त हो जाता है और इन्द्रियों के पालन में
असमर्थ हो जाता है । इसलिए जीवन में शास्त्रानुसार सदाचार,
शुभ आचरण और सत्कर्म आवश्यक है । जब इन्द्रियों पर आसुरी
भाव आ जाते हैं, तब दैवी शक्ति समाप्त होने लगती है । इसका