दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
DevanagariHindipublished156 पृष्ठ
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श्रो दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६८
भक्त को अपना जीवन निष्छल प्रेममय बनाना चाहिए तभी तो
प्रेम-नगर में स्थान मिलेगा ।
आइए हम सब प्रेम से मिलकर गाये—
प्रेम नगर में जाना है ।
जो शीश तली पर धर न सके, वह प्रेम गली में आये क्यों ?
जिसे प्रेम नगर में जाना है, वह जग में चित्त भरमाये क्यों ?
तुझे काम-क्रोध से बचना है, यह माया की सब रचना है ।
जो मन विषयों से मोड़े नहीं, वह भक्ति का ढोंग रचाये क्यों ?
जो प्रेम नगर में रहते हैं, उन्हें लोग बावरा कहते हैं ।
जो ताने जग के सह न सके, वह प्रोतम से नैन मिलाये क्यों ?
जो प्रकाश प्रेम का पा न सके, वह इष्टदेव अपनाएँ क्यों ?