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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

६६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मध्यम चरित्र
द्वितीयोऽध्यायः
द्वितीय-चरित्र-प्रथम चरित्र की भाँति द्वितीय चरित्र भी
आख्यान द्वारा प्रतिपादित किया गया है। श्रोता की श्रद्धा से
द्रवित होक बिना पूछे ही आगे का वर्णन किया गया है; यही
गुरु-कृपा है-शास्त्र-संकेत है-
ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवोः दीन वत्सलाः ।
दीन वत्सल गुरुजनों को स्नेही शिष्यों के लिए तात्विक
उपदेश कहना हो चाहिए। क्योंकि-
गूढ़ तत्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जँहा पावहि ।
इस सिद्धान्त से इसमें गुरु की अहेतु की कृपा ही कारण
है ।
मध्यम चरित्र के द्वितीय अध्याय की कथा से पूर्व माँ का
ध्यान, और इसके विनियोग पर विचार कर लेना आवश्यक है ।
‘ध्यान-विनियोग-कथा’
ध्यानम्
ॐ अक्षस्रक् परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकाम्,
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टा सुरा भाजनम् ।
शूलं पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननाम्;
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोज स्थिताम् ॥
कमलासन पर विराजमान, प्रसन्न मुख मुद्रा से सुशोभित,
महिषासुर-मर्दिनी, भगवती महालक्ष्मी माँ को मैं प्रणाम करता
हूँ, जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, धनुष,
कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शङ्ख, घण्टा, मधु पात्र, शूल,
पाश और चक्र धारण करती है ।
विनियोग
ॐ मध्यम चरित्रस्य विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता,