दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
के लिए मूर्त रूप का सहारा लिया जाता है। उदाहरणार्थ अमूर्त
गन्ध को समझने के लिए मूर्त पुष्प का आश्रय लिया। हम जिसे
भी गले लगाते हैं, छाती से चिपकाते हैं तभी तक, जब तक उसमें
चैतन्य विराजमान है। जहाँ मालूम हुआ कि इसमें अब चैतन्य
नहीं है उसी क्षण हटा देते हैं, चाहे कितना भी अनन्य सगा -
सम्बन्धी क्यों न हो। इससे सिद्ध है कि हम सब न दीखने वाले
भगवान् से ही प्रेम करते हैं दीखने वाले वाह्य आकार से नहीं।
समस्त व्यवहार परमात्मा से ही हो रहे हैं, ऐसा तात्विक
बोध होने पर व्यक्ति को सुख-दुःख की स्थिति भी विचलित नहीं
कर सकती। साधक और भक्त प्रारब्ध से कदापि सुख की
कल्पना नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि जरा सी धड़कन बन्द
होते ही सुख के साधन पड़े ही रह जायेंगे। अतः वे दुःख को
अपने कर्मों का फल और सुख को परमात्मा की कृपा ही मानते
हैं। दूसरे सुख की आशा करना ही मधु है-राग है और दूसरे से
दुःख की आशा करना कैटभ है-