दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 86, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंमी जागता है, जगत् जागता है तो संयमी सोता
है । भाव यह है कि दुनियाँ भगवान् से सोई हुई है और नाशवान्
में जगी हुई है ।
दूसरी बात यह है कि व्यवहार काल में जैसे तत्वज्ञ महा-
पुरुष भी अविद्या में आकर ही व्यवहार करता है-हँसने रोने
की लीला संसारी लोगों के कल्याण के लिए करता है-लोक -
संग्रह के लिए यह लीला बन्धन कारक नहीं होती-
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्म फले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति, कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १/१४ ॥
निष्क्रिय ब्रह्म रावण एवं कंस का संहार नहीं कर सकता,
उसे भी माया शक्ति के द्वारा श्री राम या श्री कृष्ण वेश में आना
पड़ता है । ऐसे यहाँ जब ब्रह्मा जी पर संकट देखा तो उनके
लिए करुणा करके महामाया का आश्रय लेकर विष्णु भगवान्
भी जागे और लड़ने लगे । प्रत्येक मानव शक्ति-पुञ्ज है, अपार
शक्ति-आगार है । मनुष्य एवरेस्ट पर विजयी बना । चंद्रलोक
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