दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
को प्राप्त कर सकता है । जिस शक्ति से राग-द्वेष के मधु-कैटभ
का वध कर सकता है ।
विष्णु भगवान् पाँच हजार वर्षों तक लड़ते रहे, किससे ?
अपने कर्णमैल से उत्पन्न हुए मधु कैटभ से-राग-द्वेष से । समझने
की बात है राग-द्वेष जिस अन्तःकरण से पैदा होते हैं उसी से
लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं उसकी शान्ति भंग कर देते हैं । यह
कितना अच्छा होगा कि दूसरों की निन्दा स्तुति का परित्याग
कर उतनी देर आत्म चिन्तन करें, स्वाध्याय करें अथवा जप
करे; जिससे अपना कल्याण हो और अन्तः करण से प्रसूत होने
वाले राग द्वेष का प्रसव (जन्म) ही न हो सके । तब न रहेगा
बाँस न बजेगी बाँसुरी । इसके विपरीत दूसरे का चिन्तन
करने से अन्तःकरण दूषित होता है और समय का दुरुपयोग
भी होता है, और छाती पर खड़े हो जाते हैं घोर यन्त्रणा देने
वाले काम-क्रोध, लोभ-मोह जैसे सेनापतियों सहित राग-द्वेष
जैसे अप्रतिम प्रबल बलशाली शत्रु ।
पाँच हजार वर्षों में प्रथम 'पाँच' शब्द संख्या वाची है ।
पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; पंच महाभूत, पञ्च-
तन्मात्रायें अथवा प्रपञ्चों में ही जोड़ लिया जाय, तब इन सब
के संघात से जीव देह धारण करता है, और जब तक जीव
इन प्रपञ्चों से जुड़ा रहता है तब तक अन्त वाला होते हुए भी
अनन्तकाल तकभटकता रहता है; क्योंकि अन्ते या मतिः सा गतिः
अर्थात् अन्तकाल में इस प्रपञ्च की जिस वस्तु या व्यक्ति की
याद आयेगी आगे का जीवन उसी के अनुसार होगा । इस बात
का प्रत्यक्ष प्रमाण है जड़ भरत का जीवन, जिन्हें मृग शावक
की वासना से मृग-योनि में पैदा होना पड़ा ।
श्रीमद्भागवत महापुराण में पुरञ्जन की कथा भी इस बात
की पुष्टि करती है कि पुरञ्जन को अन्तिम समय में
पुरञ्जनी के चिन्तन के कारण अगले जन्म में नारी शरीर धारण
करना पड़ा ।