दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६६
सर्वोपरि समझनी चाहिए क्योंकि जो राग-द्वेषादि संसारी जनों
के प्रति घातक हैं वही परमात्मा के प्रति समर्पण से साधना है ।
भगवान् के चरणों में ही मधु-कैटभ का वध हुआ है । कितना
सुन्दर संकेत है कि इन दोनों राग-द्वेष का नाश प्रभु के चरणों
में ही होता है ।
सुदर्शन चक्र का भाव भी स्वदर्शन, आत्मबोध है । आत्म-
बोध होने से दोषों से सर्वथा मुक्ति मिल जाती है, क्योंकि
उस आत्मवान् का कोई अपना-पराया नहीं होता है, जब दूसरे
की प्रतीति ही नहीं, तो राग-द्वेष होगा किससे ?
निर्द्वन्द्वो नित्य सत्त्वस्थो निर्योग क्षेम आत्मवान् । गीता ।
आत्म-निष्ठ में निर्द्वन्द्वता, निश्चिन्तता सहज आ जाती
है ‘कोई गैर नहीं कोई और नहीं’, इस निश्चय से जीवन सरस
होता है, क्योंकि राग होने पर विषयों का चिन्तन, चिन्तन से
मिलन की कामना (इच्छा) उदय होती है । कामना-पूर्ति से
लोभ और मोह तथा काम-पूर्ति न होने पर क्रोध, तथा क्रोध से
मोह तत्पश्चात् बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है; विनाश के लक्षण हो
जाते हैं ।
इस संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के आसक्ति-वंश-वृक्ष
विकास का अवलोकन-मनन आवश्यक ही नहीं वरन् वरणीय
है । अतः देखिये :—
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति । गी २/६२
अतः प्रबल शत्रु राग-द्वेष ही हैं इन्हीं से काम-क्रोधादि
प्रकट होते हैं :
काम एष क्रोध एष रजो गुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥गी० ३/३७।