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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 156 में से

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पृष्ठ 82

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५८
तक मूल में देख सकते हैं। ब्रह्मा जी स्तुति करते हैं, तुम्हीं स्वाहा
(देवताओं का भोजन), तुम्हीं स्वधा (पितरों का भोजन),
तुम्हीं वषट्कार हो। तुम्हीं नित्य अक्षर प्रणव में अकार,
उकार, मकार इन तीन मात्राओं के रूप में हो। इनके
अतिरिक्त जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता वह बिन्दु
रूपा, अर्द्ध मात्रा रूपा भी तुम्हीं हो। यहाँ दार्शनिकों के लिए
स्पष्ट किया गया है कि जिस परमात्मा का वाचक प्रणव है—
तस्य वाचकः प्रणवः, वही ओंकार पराम्बा का स्वरूप है अथवा
पराम्बा ही ओंकार स्वरूपा है।
पुनश्च:—हे देवी ! तुम्हीं सन्ध्या सावित्री हो, सृष्टि स्थिति,
संहारकारिणी हो; तुम्हीं महा-विद्या, महा-मेधा, महास्मृति,
तुम्हीं प्रकृति और तुम्हीं बोध स्वरूपा बुद्धि हो। तुम्हारे सभी
आयुध कल्याणकारी हैं। तुम्हीं सुन्दरता का स्रोत हो, परा और
अपरा दोनों से परे तुम्हीं हो। जो कुछ भी दिखाई, सुनाई या
प्रतीति हो रही है, वह सब कुछ तू ही तू है।
जब भगवान् को भी तुमने निद्रा-निमग्न कर दिया है, तब
भला तुम्हारी स्तुति किस शक्ति से की जाये, क्योंकि शक्ति तो
तुम स्वयं ही हो। अब कृपा कर इन दोनों दैत्यों को मोहित कर
भगवान् को जगा दो, जिससे जगकर आपकी शक्ति पाकर वे
इन दोनों को मार डाले।
इस प्रकार स्तुति करते ही महा माया योग-निद्रा भगवान्
विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकल कर
ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हो गई। भगवान् जग गये, उन्होंने
देखा, दो विशाल दैत्य ब्रह्मा जी को खाने का प्रयत्न कर रहे हैं।
तत्काल भगवान् ने उन्हें ललकारा—युद्ध प्रारम्भ होकर पाँच
हजार वर्षों तक चलता रहा; किन्तु विजयश्री ने किसी का वरण
नहीं किया। उसी समय महामाया ने उन दैत्यों को मुग्ध कर
दिया; जिससे वे भगवान् से बोले—