दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६०
कीटवद् भाति कीटभ एव कैटभः एक कीड़ा ऐसा होता है जो
लकड़ी में छेद कर देता है । छोटा कीड़ा इतनी कठोर लकड़ी
को छेद डालता है—यही द्वेष है, शत्रु है शातनात् शत्रुः जिसके
चिन्तन मात्र से दिल दिमाग में छेद होता रहे, ऐसा विचित्र
शत्रु है यह द्वेष । जिस वस्तु, व्यक्ति से द्वेष हो जाता है वह
व्यक्ति नगर से, देश से क्या पृथ्वी से भी चला जाय, किन्तु
हृदय पटल से विलीन नहीं होता, उसका नेगेटिव फोटो चित्त
में अंकित हो जाता है, जो चिन्तन करने से दुःख दग्ध करता
है । शत्रु बाहर के नहीं, बाहर नहीं अपितु अपने ही हैं और
अन्दर से ही हैं जो राग-द्वेष के रूप में रहते हैं इन्हीं से जीव-
बंधा हुआ है ।
इन्हीं से सजग करने के लिए गीताकार कहते हैं—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे, राग द्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३-३४ ॥
अर्थात् इन्द्रियों का विषयों पर सहज राग-द्वेष निश्चित
है । अतः बड़ी सावधानी से इन दोनों राग-द्वेष शत्रुओं से बचना
चाहिए; लक्ष्य में ये ही बाधक हैं । जिन्होंने इन दोनों को जीत
लिया, वे ही परम प्रसाद के अधिकारी हैं ।
राग द्वेष वियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६४ ॥
राग-द्वेष रूपो लुटेरों से सुरक्षित रहते हुए जिसकी इन्द्रियाँ
विषयों के प्रति सहज भाव से व्यवहार करती हैं-न किसी वस्तु
के पाने की आकांक्षा है न किसी पदार्थ से विरोध या घृणा; न
किसी से अटके न सटके, ऐसे साधक साध्य को शीघ्र प्राप्त कर
लेते हैं । इन्द्रिय दास को मानसकार ने अभागी शब्द से
सम्बोधित किया है—
उमा कहूं ते लोग अभागी - हरि तजि होयँ विषय अनुरागीं ।
इन्द्रिय लोलुप जे जग माँही, विषय भोग पर प्रीति सदाई ॥