दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६४
पुराणों में संख्या का भाव अनन्त अर्थ में ग्रहण किया
जाता है । अन्तमयी सृष्टि का अन्त भी अनन्त में होता है और
सृजन भी ! आपने देखा कि पाँच तत्वों का संयोग पाते ही
अनन्त जीव अनन्त ईश्वर का अंश अन्त वाला-नाशवान बन
गया, और यूं जन्म-मरण के आवागमन चक्र में भटकने लगा,
जिसका मूल कारण बन गया राग-द्वेष ।
अब प्रश्न उठता है इस राग-द्वेष का नाश कैसे हो ?
यद्यपि आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय तथा जप का संकेत अभी दिया
था फिर भी राग-द्वेष की संक्रामक व्याधि का उपचार इनके
उलटने में ही है । संसार के राग को उलट कर अनन्त
(भगवान्) से अनुराग कीजिए :-
मिलहि न रघुपति बिन अनुरागा, किये कोटि जप जोग विरागा ।
मम दर्शन फल परम अनूपा, जीव पाय निज सहज स्वरूपा ॥
बिना अनुराग के परमात्मा नहीं मिलते हैं । अनुराग
हृदय की सहज वृत्ति है, केवल उसकी दिशा परिवर्तित करनी
है । जहाँ-जहाँ मन जाता है वहीं-वहीं परमात्मा का दर्शन
कीजिए । 'परमात्मा का दर्शन' कैसे करें-इस पर विचार
कीजिए कि जहाँ मन जाता है वहाँ परमात्मा का अस्तित्व है
या नहीं, तब मालूम पड़ेगा कि परमात्मा के अस्तित्व के बिना
कोई पदार्थ, वस्तु या व्यक्ति रह नहीं सकता ।
माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि या अन्यों के साथ जो भी
व्यवहार होता है वस्तुतः परमात्मा के ही साथ होता है, क्योंकि
परमात्मा से सम्बन्ध छूटते ही सब अस्पृश्य हो जाते हैं ।
अतः स्वतः सिद्ध हो रहा है, हमारे समस्त व्यवहार परमात्मा
से ही हो रहे हैं । इस सत्य को न समझने के कारण ही हम
ब्राह्य आकार को ही प्रेम या द्वेष का अधिष्ठान समझे हुए हैं ।
वृहदारण्यक उपनिषद् में यह बात बहुत स्पष्ट रूप में
वर्णित है कि परमात्मा के मूर्त और अमूर्त रूप को समझने