दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
एक बार देवासुर संग्राम में देवता लोग हार गये । तभो
सभी देवता ब्रह्मा जी को साथ लेकर भगवान् विष्णु और
शिवजी के पास गये और विस्तार से अपनी व्यथा सुनाई ।
यह सुनकर दोनों देवों ने क्रोध व्यक्त किया, जिससे विष्णु जी के
मुख से एक महान् दिव्य तेज प्रकट हुआ । इसी प्रकार ब्रह्मा जी,
शंकर जी, इन्द्र, वरुणादि देवताओं के शरीरों से भी एक-एक
तेज निकला और वे सब तेज मिलकर जाज्वल्यमान पर्वत सा
एक तेजपुञ्ज रूप में देवताओं को दिखाई दिया । फिर वही
विशाल तेज-पुञ्ज एक नारी के रूप में परिणत हो गया ।
शिवजी के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से
देवी के सिर के केश, विष्णु तेज से उनकी भुजायें, चन्द्र तेज से
दोनों स्तन, इन्द्र तेज से कटि, वरुण तेज से जङ्घा, पृथ्वी तेज से
नितम्ब, ब्रह्मा तेज से चरण, सूर्य तेज से अंगुलियाँ, वसुओं के
तेज से हाथ की अंगुलियाँ, कुबेर के तेज से नासिका, प्रजापति
के तेज से दाँत, अग्नि के तेज से त्रिनेत्र, सन्ध्या भृकुटि और
वायु के तेज से कान प्रकट हो गये । फिर उस महाशक्ति को
सभी देवताओं ने अपने-अपने विशेष आयुद्ध एवं आभूषण प्रदान
किये । अब देवीजी समस्त आयुधों और आभूषणों से युक्त हो
गई । तब क्षीर-सागर ने भी दिव्य हार, दो दिव्य वस्त्र,
चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्द्ध चन्द्र, बाजूबन्द, नूपुर,
गले की हँसली और रत्न जटित अंगूठियाँ प्रदान की ।
विश्वकर्मा ने फरसा और कवच दिया और सुन्दर कमलों
की माला पहनाई । उसी समय पर्वतराज हिमालय ने उन्हें
अपरिमित रत्न और सवारी के लिए सिंह प्रदान किया । अब
सुसज्जित होकर उस महाशक्ति ने ऐसा अट्टहास किया, जिससे
आकाश निनादित हो उठा, ब्रह्माण्ड काँप उठे, धरा डोलने लगी
और देवता प्रसन्न होकर जय-जयकार करने लगे ।
युद्ध की ललकार सुनकर दैत्यराज महीषासुर अपने बलिष्ठ