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दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

५१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
ये चारों पण्डित सम्पूर्ण रामायण की कथा सूत्रात्मक शैली में
कह रहे हैं। आश्वस्त होकर राजा ने तब उनका सम्मान किया ।
यह कथा 'जैसे तुम भी वैसे हम भी' सुरथ-समाधि के
लिए ही कही गई है । जीव में समाधि (समाहित चित्त की
स्थिति) एक ही होती है । संकल्प-काल में चंचल-वृत्ति का
चित्त है; किन्तु स्थिर होने पर वही आत्मा है। यह योगवाशिष्ठ
में स्पष्ट है । इस प्रकरण में चित्त की अवस्थाओं पर
विच्चार कर लेना अति प्रासङ्गिक होगा ।
चित्त की अवस्थायें :
(१) मूढ़-विकार ग्रस्त तमः प्रधान (२) क्षिप्त-
रजोगुणी, धर्माधर्म दोनों में प्रवृत्ति; यही विक्षिप्त भी है,
जिसमें विशेष मनोराज्य होता है,, जैसे इस समय घर की याद
करके 'सुरथ और समाधि का चित्त हो रहा है (३) सत्वगुणी-
धर्म में प्रवृत्ति (४) एकाग्रावस्था-एक ही विषय में सहज
वृत्तियों का प्रवाह रहता है । (५) निरुद्ध-देशान्तर,
कालान्तर, वस्त्वन्तर की दौड़ छोड़ कर अपनी ओर लौटना ही
दृष्टा ज्ञान है, भान है, अनुभव है। जब तक दृश्य में महत्व
बुद्धि रहेगी, तभी तक दृश्य प्रपञ्च सत्य प्रतीत होता है; अपना
ही स्वरूप जगत् है, यही अवस्था समाधि है ।
संत भोले बाबा ने कहा : इस देह को मैं मानने से एक
दो भासता । दो से बहुत हो जाँय है-एक दूसरे को त्रासता ।
दर्पण भवन कुत्ता घुसा, तो कुत्ता ही सब दिखलात है ।
बैरी समझ कर भौंकता ही भौंकता मर जात है ॥
यही दशा होने पर जीव दुखित होता है ।
अब सुरथ समाधि के साथ हो गयो, तो श्रद्धा का उदय
हुआ । दोनों मिलकर पूज्य भाव से मेधा ऋषि के चरणों में
उपस्थित हुए, श्रद्धावनत होकर प्रणाम किया और विनीत भाव
से पूछा । यहाँ इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि सुरथ

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५२
इन्हीं ऋषिचरणों में उपस्थित होकर उनका उपदेश सुन चुका
था, किन्तु उस समय विक्षिप्त था और अब निरुद्ध अवस्था में
होने से समाधि भी साथ है अतः श्रद्धावान् है। श्रद्धावान् लभते
ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः (गीता) । श्रद्धा बिना धर्म नहि होई
(मानस) ।
‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ कहकर ही अर्जुन ने
शिक्षा प्राप्त की थी। श्रद्धावान् के लिए गुरु शरण में पहुँच कर ही
ज्ञान प्राप्ति कही गई है। इसी प्रकार आज गुरु चरणों में अपनी
मोह-व्यथा निवेदन करते हुए सुरथ बोले—
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्ट मानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढ़ता ॥ ४५
ऐसी मूढ़ता या मन की । (विनय पत्रिका)
उपदेश श्रवण की यही परम्परा है, सुनने की बेचैनी हो,
अथाह श्रद्धा हो, योग्य गुरु हो । सब का मधुर मिलन हुआ ।
महर्षि मेधा बोले—हे भाग्यवान् ! जीव मात्र तीन प्रकार के हैं—
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथा परे ।
केचिद् दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्य दृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥ ४८-४६
(१) दिनान्ध-कुछ प्राणी दिन में अन्धे होते हैं । दिन
शब्द काव्य प्रकाश-सप्तम उल्लास में प्रकाश अर्थ में प्रयुक्त हुआ
है । भारत में जन्म, सत्सङ्ग का सुयोग और समय भी अनुकूल,
त्तथापि सत्संग में न जाना, ज्ञान प्राप्त न करने की प्रवृत्ति वाले
दिन में अन्धे हैं ।
(२) रात्र्यन्ध-जिन्हें सत्संग से प्रयोजन ही नहीं है ।
अविवेकी, गुरुतर मूढ़ हैं, किसी हितैषी की भी बात सुनना पसंद
नहीं करते; ऐसे व्यक्ति रात्रि में अन्धे हैं ।

५३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(३) निपट अन्ध-उनके लिए दिन भी रात है। जो लोग
ज्ञान-भक्ति दोनों से अलग रहते हैं। चार्वाक् के सिद्धान्तानुसार
'खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ' वाले उदरम्भरी पशु-प्रवृत्ति के हैं
वे इसी श्रेणी के हैं।
आहार-निद्रा-भय-मैथुनञ्च, सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषः धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥
यद्यपि आहार - निद्रा - भय - मैथुन की प्रवृत्तियां पशु -
पक्षियों तथा प्राणीमात्र में समान हैं; किन्तु बुद्धि या ज्ञान ही
मनुष्य को इनसे विलग करता है; जिससे वह अपने को आत्म-
स्वरूप को समझ सकता है। भगवान् कहते हैं-
सब मम प्रिय, सब मम उपजाये ।
सबते अधिक मनुज मोहि भाये॥ (मानस)
मनुष्य ही विवेक का सम्मान करने में समर्थ है। अतः
मनुष्य को ही समस्त शास्त्र-पुराण समझाये जा सकते हैं। वैसे
काकभुशुण्डि जी भी कथा व्यास हैं, किन्तु वे अपवाद हैं। जिस
मनुष्य ने ज्ञान और विवेक का इतना अधिकार प्राप्त किया है;
वही प्राप्त विवेक का अनादर कर दुःखी हो रहा है यही माया
की लीला है, यही भ्रम, भूल एवं अज्ञान है। सूर्य-पुत्र होकर भी
अज्ञानान्धकार में भटकते हुए दुःखी होना जीव की घोर विडम्बना
है। 'तथापि ममतावर्ते मोह गर्ते निपातिताः' समझदार होने पर
भी मनुष्य अपने द्वारा कल्पित तथा निर्मित, मन से माने हुए
स्त्री, पुत्र, मित्रों के जाल में फँस कर मोहित हो जाता है, यही
मोह के गहरे गड्ढे में गिरना है। इससे निकलना बड़ा दुर्लभ
है।
को छूट्यो इहि जाल परि, कत कुरंग अकुलात ।
ज्यों ज्यों सुरझि भज्यो चहत, त्यों त्यों हि उरझि जात ॥
संसार के जाल से निकलना सचमुच ही दुर्लभ है। इसमें
आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् भगवान्
की माया से मोहित हो रहा है। यह महामाया देवी बड़े-बड़े

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५४
ज्ञानियों, योगियों तथा तपस्वियों को अपने इंगित पर नृत्य
कराती रही है। नारद, पराशर, विश्वामित्र की तो बात ही
क्या, स्वयं ब्रह्मा और शंकर भी इस माया-पाश में आबद्ध हुए
हैं, फिर सामान्य जनों की तो बात ही क्या ? इसलिए साधक को
बहुत सजग एवं सावधान रहना चाहिये ।
वर्तमान में ही एक बहुत बड़े तपस्वी महात्मा भाऊपुर में
रहते थे; वे नित्य प्रातः एवं सायं भ्रमण के लिए ही कुटिया से
निकलते थे। रास्ते में एक परिचित श्रद्धालु देवी पूछती थी
“आप कहाँ जा रहे हैं ? प्रतिदिन वे इस प्रश्न को सुनते थे,
उत्तर नहीं देते थे, नीचे को सिर किये हुए चले जाते थे।
जब उनका अन्तिम समय आया; प्राण जाने वाले थे, तभी
उन महापुरुष ने उस देवी को बुलाया और कहा- देवी !
तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं आज दे सकता हूँ क्योंकि आज मैं
अपने घर जा रहा हूँ। मन की गति बड़ी चञ्चल होती है”
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथी बलवद् दृढम् । (गीता)
शरीर में प्राण रहते हुए कहीं मैं अनुचित घर की ओर कदम न
रख देता, इसी से अब तक उत्तर न दे सका था। इस दृष्टान्त
से हमें भी सीख लेनी चाहिए ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । ५५
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ ५६
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्त र्हेतुभूता सनातनी ॥ ५७
संसार बन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ ५८
यह महामाया ही मेरी माँ है । माँ की करुणा और
वात्सल्य भरा हृदय पुत्र के लिए कल्याणकारी होता है । उनकी
प्रसन्नता ही मुक्ति का वरदान है। वे पराविद्या ही संसार रचती
हैं । संसार-व्यवहार में अज्ञानी-जन अपने को बंधन में बंधा हुआ

५५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मानते हैं जबकि बन्धन-काल में भी वह मुक्त ही है । अज्ञता
के कारण ही अपने को बंधा समझता है और बन्धन के कारणों
को कल्पित करके दुःखी होता रहता है ।
कालहिं कर्महि ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाइ (मानस)
इस दुःख में उसकी भूल, उसका अज्ञान ही कारण है ।
विद्वद्जन महामाया शब्द के व्युत्पत्यर्थक भिन्न-भिन्न
अर्थ करते हैं-मीयते जगदनयेति माया अथवा ब्रह्मानन्द साक्षात्कारे
प्रतिषेधं याति माया यद् दृश्यते तन्न सत्यमिति माया अर्थात्
जिससे संसार बनता है । ब्रह्मानंदानुभूति होने पर जिसका
सर्वथा निषेध हो जाता है अथवा जिसके कारण प्रतीयमान
प्रपञ्च सत्य न होने पर भी सत्य सा दिखाई दे रहा है, वही
माया है । यह वेदान्त दर्शन है ।
शाक्त-साधकों के लिए यह महामाया माँ है; माँ के लिये
भक्त की भावना इस रूप में उद्वेलित हुई है-कुपुत्रो जायेत
क्वचिदपि कुमाता न भवति, पुत्र कितना भी कुपुत्र हो जाये,
किन्तु माँ का स्नेहिल हृदय पुत्र के लिये करुणा परिपूर्ण ही
रहता है । माया कृपायां दम्भे च, माया का अर्थ कृपा भी है,
कुम्हार के घड़े का भीतरी हाथ है । भेद केवल दृष्ट का है,
विचार का है; भगवान् के मोहिनी रूप को देख कर देवता
प्रणाम् करते हैं और दानव उद्धत्तता से परिपूर्ण विलासमयी
चितवन् से निहारते हैं ।
इस दैवी भाव की दिव्यता से द्रवित हृदय राजा ने
गुरुदेव के श्रुत उपदेश के पश्चात् पूछा-हे भगवन् ! आप जिसे
महामाया कहते हैं वे कौन हैं ? कृपया उनके प्राकट्य, स्वभाव
एवं चारित्रिक महत्व का वर्णन कीजिए । श्रद्धा एवं प्रेम से
पूछे गये प्रश्न को सुनकर प्रसन्नमना मुनि ने कहा :
नित्यैव सा जगन्मूर्त्तिस्तया सर्वमिदं ततम् । ६४
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५६
हे राजन् ! वे भगवती पराम्बा नित्य स्वरूप हैं, यह
जगत् उन्हीं का रूप है, सब में वे ही व्याप्त हैं। उनमें सब और
सब में वे ही हैं, तथापि समय समय पर वे देवों की कार्य-सिद्धि
के लिये प्रकट होती हैं; यही उनकी करुणा है, वे साकार होने
पर भी निराकार और निर्विकार ही रहती हैं।
आप लोग इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए—चेतन आत्मा के
स्वरूप को ही यहाँ पराम्बा के रूप में बताया गया है । आप
जानते हैं कि जीवित प्राणियों की देह से तभी तक प्रेम रहता है,
या करते हैं; जबतक उसके भीतर चेतना का अनुभव हो रहा
है। इस से सम्बन्ध हटते ही उसी देह को गंगा में प्रवाहित :कर
दिया जाता है। अतः स्पष्ट हो गया कि प्रेम दीखने वाली;
दिखाई देने वाली देह से नहीं होता अपितु देह में न दिखने
वाले चेतन से होता है; किन्तु अज्ञान के कारण मानव-देह
वियोग का अनुभव करती है।
आप भक्तजन पाषाण-प्रतिमा के सामने भी "मनोजवं
मारुततुल्य वेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्" बोलते समय उस
साकार मूर्ति में व्याप्त चेतन हनुमान जी का ही अनुभव करते
हैं। वही चेतन परमात्मा निरुपाधि होने पर भी उपाधि वाला,
निराकार होने पर भी साकार होने वाला अकारण ही अपनी
कृपा-वश होकर साकार हो जाता है। जैसे भ्रम या भूल वश
कोई व्यक्ति कुएँ में गिर पड़ता है तो उसे निकालने के लिए
'गोताखोर' को भी कुएँ में जाना पड़ता है। ऐसे ही भव कूप में
पड़े हुए जीवों का उद्धार करने के लिए वही कभी राम, कभी
घनश्याम, कभी मोहिनी, कभी स्वयं पराम्बा भगवती के रूप में
अवतरित हो जाता है। भक्तजन उसकी लीलाओं में निमग्न रहते
हैं। ऐसा कहकर महर्षि कथा सुनाने लगे।
कल्प के अन्त में सम्पूर्ण जगत् के एकार्णव (क्षीरसागर)
में निमग्न होने पर विष्णु भगवान् योग निद्रा का आश्रय ले शयन

कर रहे थे; उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ
नाम से विख्यात दो भयंकर असुरों ने जन्म लिया। पैदा होते
ही भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्मा
जी को खाने के लिए दौड़े। उन दोनों भयानक असुरों को अपने
पास आये और भगवान् को सोये हुए देखकर ब्रह्मा जो घबरा
गये। उन्होंने भगवान् को जगाने के लिए एकाग्रचित्त-होकर
उनके नेत्रों में निवास करने वाली योग-निद्रा का स्तवन किया।
इसी स्तुति को 'रात्रि-सूक्त' कहते हैं।
इस कथा का भाव यह है : सर्वत्र व्याप्त सत्ता को विष्णु
कहते हैं। 'विष्लृ व्याप्तौ' वेवेष्टेति विष्णुः वह परमात्मा सर्वत्र,
सर्वथा, सर्वदा होने पर भी सत्वगुण में बुद्धि स्थिर होने पर ही
अनुभव में आता है। रजो गुण और तमो गुण की अवस्था में
उसका अनुभव नहीं होता है। क्षीर सागर सत्वगुण का रूप है।
जल शीतल, सुखद, मधुर होता है—जल जीवन का भी पयोय है,
रस है, 'रसो वै सः' परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है, इसी से
शान्त प्रकृति के साधु महात्मा अपने अन्तःकरण के प्रकाशक
आत्मा को अपने में ही अनुभव करके सदा प्रसन्न रहते हैं। उन
भगवान् की नाभि ही आकाश है। भागवत् में यह प्रयोग आया
है—"नभः एव नाभिः"। इसी व्याप्त आकाश (नाभि) से अना-
सक्ति का प्रतीक कमल पैदा होता है। जिससे ब्रह्मा जी प्रकट
होकर सृष्टि रचना करते हैं।
इस पुराण भाषा को आप समझ गये होंगे कि न आकाश
में कमल पुष्प होता है और न ब्रह्मा जी प्रकट होकर सृष्टि रचना
करते हैं 'यह भाषा प्रतीयमान जगत् परमात्मा है।' के रहस्य को
समझाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। 'सर्वं खल्विदं
ब्रह्म'।
रात्रि-सूक्त में की गई स्तुति बड़ी ही मार्मिक है। यह
स्तोत्र प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या सत्तर से सतासी श्लोक

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५८
तक मूल में देख सकते हैं। ब्रह्मा जी स्तुति करते हैं, तुम्हीं स्वाहा
(देवताओं का भोजन), तुम्हीं स्वधा (पितरों का भोजन),
तुम्हीं वषट्कार हो। तुम्हीं नित्य अक्षर प्रणव में अकार,
उकार, मकार इन तीन मात्राओं के रूप में हो। इनके
अतिरिक्त जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता वह बिन्दु
रूपा, अर्द्ध मात्रा रूपा भी तुम्हीं हो। यहाँ दार्शनिकों के लिए
स्पष्ट किया गया है कि जिस परमात्मा का वाचक प्रणव है—
तस्य वाचकः प्रणवः, वही ओंकार पराम्बा का स्वरूप है अथवा
पराम्बा ही ओंकार स्वरूपा है।
पुनश्च:—हे देवी ! तुम्हीं सन्ध्या सावित्री हो, सृष्टि स्थिति,
संहारकारिणी हो; तुम्हीं महा-विद्या, महा-मेधा, महास्मृति,
तुम्हीं प्रकृति और तुम्हीं बोध स्वरूपा बुद्धि हो। तुम्हारे सभी
आयुध कल्याणकारी हैं। तुम्हीं सुन्दरता का स्रोत हो, परा और
अपरा दोनों से परे तुम्हीं हो। जो कुछ भी दिखाई, सुनाई या
प्रतीति हो रही है, वह सब कुछ तू ही तू है।
जब भगवान् को भी तुमने निद्रा-निमग्न कर दिया है, तब
भला तुम्हारी स्तुति किस शक्ति से की जाये, क्योंकि शक्ति तो
तुम स्वयं ही हो। अब कृपा कर इन दोनों दैत्यों को मोहित कर
भगवान् को जगा दो, जिससे जगकर आपकी शक्ति पाकर वे
इन दोनों को मार डाले।
इस प्रकार स्तुति करते ही महा माया योग-निद्रा भगवान्
विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकल कर
ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हो गई। भगवान् जग गये, उन्होंने
देखा, दो विशाल दैत्य ब्रह्मा जी को खाने का प्रयत्न कर रहे हैं।
तत्काल भगवान् ने उन्हें ललकारा—युद्ध प्रारम्भ होकर पाँच
हजार वर्षों तक चलता रहा; किन्तु विजयश्री ने किसी का वरण
नहीं किया। उसी समय महामाया ने उन दैत्यों को मुग्ध कर
दिया; जिससे वे भगवान् से बोले—

५६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्”
हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं, जो चाहो, वरदान माँग लो ।
तब भगवान् ने कहा—‘भवेतामद्य मे तुष्ठौ मम वध्यावुभा-
वपि । किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम । ६८ । यदि तुम
लोग मुझसे प्रसन्न हो, तो मेरे हाथ से मारे जावो, यही वरदान
दीजिए । यह सुनकर वे बोले—जहाँ पृथिवी पर जल की बूँदें न
हों न सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो । भगवान् कमल नयन
ने ‘तथास्तु’ कहकर विराट स्वरूप धारण कर दोनों के सिर
अपनी जङ्घाओं पर रख कर चक्र से काट डाले । इस प्रकार वह
महामाया ब्रह्माजी की स्तुति से प्रकट हुई थी ।
कथा पर विचार करने से स्पष्ट भाव प्रकट होता है कि
सर्वत्र व्याप्त परमात्मा विष्णु भगवान् हैं समस्त दिशायें उनके कान
हैं । भागवत् में कहा है—इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्रः कर्णौ दिशः
श्रोत्रममुष्य शब्दः । २/१/२६ इसी से भक्त उन्हें कहीं से भी
पुकारें; वे तुरन्त सुन लेते हैं । “चींटी के पर नूपुर बाजे वह भो
साहब सुनता है ।” यह प्रसिद्ध उक्ति है । आत्मशंसा एवं परनिन्दा
सुनना इन दिशाओं रूपी कानों का मैल है । यही दोनों मधु
और कैटभ हैं, दोनों का अर्थ एक ही है । जिन लोगों को दूसरे
की निन्दा करने सुनने में रस आता है, मिठास आता है—यही
मधु-मीठा राग है—सुन-सुन कर पैदा होने वाले दोनों दैत्य हैं—
‘रज्यतेऽनेनेति रागः । पाणिनिजी का सूत्र है तेन रक्तं रागात्’
जिससे चित्त-हृदय रङ्गीन हो जाता हैं वही राग है । आजकल
स्कूल कालेजों में बालक बालिकायें परस्पर एक दूसरे की
क्षणिक विशेषतायें सुनकर परस्पर मुग्ध हो जाते हैं । माता-
पिता शास्त्र का विधान अलग कर देते हैं । यह प्रेम नहीं राग
है, मीठी जंजीर है-बाँधने वाली है । जो लोग कान के कच्चे
होते हैं उनको तो यह राग पैदा करते देर नही लगती । इसी
प्रकार द्वेष है—‘द्विगुणितं विषमितिद्वेषः’ दूना जहर है ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६०
कीटवद् भाति कीटभ एव कैटभः एक कीड़ा ऐसा होता है जो
लकड़ी में छेद कर देता है । छोटा कीड़ा इतनी कठोर लकड़ी
को छेद डालता है—यही द्वेष है, शत्रु है शातनात् शत्रुः जिसके
चिन्तन मात्र से दिल दिमाग में छेद होता रहे, ऐसा विचित्र
शत्रु है यह द्वेष । जिस वस्तु, व्यक्ति से द्वेष हो जाता है वह
व्यक्ति नगर से, देश से क्या पृथ्वी से भी चला जाय, किन्तु
हृदय पटल से विलीन नहीं होता, उसका नेगेटिव फोटो चित्त
में अंकित हो जाता है, जो चिन्तन करने से दुःख दग्ध करता
है । शत्रु बाहर के नहीं, बाहर नहीं अपितु अपने ही हैं और
अन्दर से ही हैं जो राग-द्वेष के रूप में रहते हैं इन्हीं से जीव-
बंधा हुआ है ।
इन्हीं से सजग करने के लिए गीताकार कहते हैं—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे, राग द्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३-३४ ॥
अर्थात् इन्द्रियों का विषयों पर सहज राग-द्वेष निश्चित
है । अतः बड़ी सावधानी से इन दोनों राग-द्वेष शत्रुओं से बचना
चाहिए; लक्ष्य में ये ही बाधक हैं । जिन्होंने इन दोनों को जीत
लिया, वे ही परम प्रसाद के अधिकारी हैं ।
राग द्वेष वियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६४ ॥
राग-द्वेष रूपो लुटेरों से सुरक्षित रहते हुए जिसकी इन्द्रियाँ
विषयों के प्रति सहज भाव से व्यवहार करती हैं-न किसी वस्तु
के पाने की आकांक्षा है न किसी पदार्थ से विरोध या घृणा; न
किसी से अटके न सटके, ऐसे साधक साध्य को शीघ्र प्राप्त कर
लेते हैं । इन्द्रिय दास को मानसकार ने अभागी शब्द से
सम्बोधित किया है—
उमा कहूं ते लोग अभागी - हरि तजि होयँ विषय अनुरागीं ।
इन्द्रिय लोलुप जे जग माँही, विषय भोग पर प्रीति सदाई ॥

६१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
इतने बांध बांधने पर भी ये राग-द्वेष रूपी प्रबल शत्रु किसी
को छोड़ते कहाँ हैं ? सामान्य जन की तो बात क्या, पैदा होते
ही इन दोनों ने ब्रह्मा जी पर धावा बोल दिया-विधाता पर
आक्रमण करने का यहाँ विशेष भाव है-“विधानं विधिः” ब्रह्मा
जी कानून के रूप हैं। संसार के जीने के लिए तथा जीवन को
सफल बनाने के लिए शास्त्रों ने विधान बनाया है। “रामवद्
वर्तितव्यम् न रावणादिवत्” राम की तरह आचरण करना चाहिये
रावण की तरह नहीं-यह विधान है, किन्तु राग-द्वेष हृदय में आते
ही विधान का भक्षण करने लगते हैं; कितना सुन्दर संकेत है ?
जज अपने सम्बन्धी को दण्डित नहीं कर पाता, चाहे वह सम्बन्धी
रिश्वत से ही बना हो, बड़ा व्यावहारिक है। यहाँ तक देखा
जाता है कि जिसके प्रति राग होता है वही ईमानदार और सद्गुणी
दिखाई देता है। जैसे अभी एक पुत्र ने किसी लड़की में आसक्ति
के कारण पिता की हत्या कर दी; एक पत्नी ने अपने पति की
हत्या कर दी और दोनों बच गये कानून से; तब कहाँ रहा
शास्त्र और माता-पिता तथा गुरु जनों का उपदेश ? अब समझ
लीजिए यही ब्रह्मा जी, विधान और वेद का संकेत वेद-निर्माता
ब्रह्मा जी हैं। जब शास्त्र के विधान का लोप होने लगता है,
संकट की घड़ी आती है, तभी भगवान् की याद आती है। यदि
जीवन में संकट न आवे तो कथञ्चित् भगवान् की भी याद
न आवे-
दुखों से अगर चोट खाई न होती, तेरी प्रभो ! याद आई न होती।
यही कारण है भगवान् के प्यारे भक्त यही कामना करते हैं-
सुख के माथे सिल परे, नाम हृदय ते जाय।
बलिहारी वा दुःख की, पल-पल नाम रटाय ॥
भगवान् विष्णु के शयन का भाव यह है कि शेष शब्द
अनन्तवाची है। सब कुछ प्रलय होने पर भी जो शेष रहे, वही
अधिष्ठान-तत्व शेषशायी सर्वत्र व्याप्त परमात्मा है, जिनका
अनुभव योगी जन गुणों से परे होने पर सात्विक वातावरण में

मी जागता है, जगत् जागता है तो संयमी सोता
है । भाव यह है कि दुनियाँ भगवान् से सोई हुई है और नाशवान्
में जगी हुई है ।
दूसरी बात यह है कि व्यवहार काल में जैसे तत्वज्ञ महा-
पुरुष भी अविद्या में आकर ही व्यवहार करता है-हँसने रोने
की लीला संसारी लोगों के कल्याण के लिए करता है-लोक -
संग्रह के लिए यह लीला बन्धन कारक नहीं होती-
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्म फले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति, कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १/१४ ॥
निष्क्रिय ब्रह्म रावण एवं कंस का संहार नहीं कर सकता,
उसे भी माया शक्ति के द्वारा श्री राम या श्री कृष्ण वेश में आना
पड़ता है । ऐसे यहाँ जब ब्रह्मा जी पर संकट देखा तो उनके
लिए करुणा करके महामाया का आश्रय लेकर विष्णु भगवान्
भी जागे और लड़ने लगे । प्रत्येक मानव शक्ति-पुञ्ज है, अपार
शक्ति-आगार है । मनुष्य एवरेस्ट पर विजयी बना । चंद्रलोक
[L24

६३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
को प्राप्त कर सकता है । जिस शक्ति से राग-द्वेष के मधु-कैटभ
का वध कर सकता है ।
विष्णु भगवान् पाँच हजार वर्षों तक लड़ते रहे, किससे ?
अपने कर्णमैल से उत्पन्न हुए मधु कैटभ से-राग-द्वेष से । समझने
की बात है राग-द्वेष जिस अन्तःकरण से पैदा होते हैं उसी से
लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं उसकी शान्ति भंग कर देते हैं । यह
कितना अच्छा होगा कि दूसरों की निन्दा स्तुति का परित्याग
कर उतनी देर आत्म चिन्तन करें, स्वाध्याय करें अथवा जप
करे; जिससे अपना कल्याण हो और अन्तः करण से प्रसूत होने
वाले राग द्वेष का प्रसव (जन्म) ही न हो सके । तब न रहेगा
बाँस न बजेगी बाँसुरी । इसके विपरीत दूसरे का चिन्तन
करने से अन्तःकरण दूषित होता है और समय का दुरुपयोग
भी होता है, और छाती पर खड़े हो जाते हैं घोर यन्त्रणा देने
वाले काम-क्रोध, लोभ-मोह जैसे सेनापतियों सहित राग-द्वेष
जैसे अप्रतिम प्रबल बलशाली शत्रु ।
पाँच हजार वर्षों में प्रथम 'पाँच' शब्द संख्या वाची है ।
पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; पंच महाभूत, पञ्च-
तन्मात्रायें अथवा प्रपञ्चों में ही जोड़ लिया जाय, तब इन सब
के संघात से जीव देह धारण करता है, और जब तक जीव
इन प्रपञ्चों से जुड़ा रहता है तब तक अन्त वाला होते हुए भी
अनन्तकाल तकभटकता रहता है; क्योंकि अन्ते या मतिः सा गतिः
अर्थात् अन्तकाल में इस प्रपञ्च की जिस वस्तु या व्यक्ति की
याद आयेगी आगे का जीवन उसी के अनुसार होगा । इस बात
का प्रत्यक्ष प्रमाण है जड़ भरत का जीवन, जिन्हें मृग शावक
की वासना से मृग-योनि में पैदा होना पड़ा ।
श्रीमद्भागवत महापुराण में पुरञ्जन की कथा भी इस बात
की पुष्टि करती है कि पुरञ्जन को अन्तिम समय में
पुरञ्जनी के चिन्तन के कारण अगले जन्म में नारी शरीर धारण
करना पड़ा ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६४
पुराणों में संख्या का भाव अनन्त अर्थ में ग्रहण किया
जाता है । अन्तमयी सृष्टि का अन्त भी अनन्त में होता है और
सृजन भी ! आपने देखा कि पाँच तत्वों का संयोग पाते ही
अनन्त जीव अनन्त ईश्वर का अंश अन्त वाला-नाशवान बन
गया, और यूं जन्म-मरण के आवागमन चक्र में भटकने लगा,
जिसका मूल कारण बन गया राग-द्वेष ।
अब प्रश्न उठता है इस राग-द्वेष का नाश कैसे हो ?
यद्यपि आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय तथा जप का संकेत अभी दिया
था फिर भी राग-द्वेष की संक्रामक व्याधि का उपचार इनके
उलटने में ही है । संसार के राग को उलट कर अनन्त
(भगवान्) से अनुराग कीजिए :-
मिलहि न रघुपति बिन अनुरागा, किये कोटि जप जोग विरागा ।
मम दर्शन फल परम अनूपा, जीव पाय निज सहज स्वरूपा ॥
बिना अनुराग के परमात्मा नहीं मिलते हैं । अनुराग
हृदय की सहज वृत्ति है, केवल उसकी दिशा परिवर्तित करनी
है । जहाँ-जहाँ मन जाता है वहीं-वहीं परमात्मा का दर्शन
कीजिए । 'परमात्मा का दर्शन' कैसे करें-इस पर विचार
कीजिए कि जहाँ मन जाता है वहाँ परमात्मा का अस्तित्व है
या नहीं, तब मालूम पड़ेगा कि परमात्मा के अस्तित्व के बिना
कोई पदार्थ, वस्तु या व्यक्ति रह नहीं सकता ।
माता-पिता, पुत्र-पुत्री आदि या अन्यों के साथ जो भी
व्यवहार होता है वस्तुतः परमात्मा के ही साथ होता है, क्योंकि
परमात्मा से सम्बन्ध छूटते ही सब अस्पृश्य हो जाते हैं ।
अतः स्वतः सिद्ध हो रहा है, हमारे समस्त व्यवहार परमात्मा
से ही हो रहे हैं । इस सत्य को न समझने के कारण ही हम
ब्राह्य आकार को ही प्रेम या द्वेष का अधिष्ठान समझे हुए हैं ।
वृहदारण्यक उपनिषद् में यह बात बहुत स्पष्ट रूप में
वर्णित है कि परमात्मा के मूर्त और अमूर्त रूप को समझने

६५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
के लिए मूर्त रूप का सहारा लिया जाता है। उदाहरणार्थ अमूर्त
गन्ध को समझने के लिए मूर्त पुष्प का आश्रय लिया। हम जिसे
भी गले लगाते हैं, छाती से चिपकाते हैं तभी तक, जब तक उसमें
चैतन्य विराजमान है। जहाँ मालूम हुआ कि इसमें अब चैतन्य
नहीं है उसी क्षण हटा देते हैं, चाहे कितना भी अनन्य सगा -
सम्बन्धी क्यों न हो। इससे सिद्ध है कि हम सब न दीखने वाले
भगवान् से ही प्रेम करते हैं दीखने वाले वाह्य आकार से नहीं।
समस्त व्यवहार परमात्मा से ही हो रहे हैं, ऐसा तात्विक
बोध होने पर व्यक्ति को सुख-दुःख की स्थिति भी विचलित नहीं
कर सकती। साधक और भक्त प्रारब्ध से कदापि सुख की
कल्पना नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि जरा सी धड़कन बन्द
होते ही सुख के साधन पड़े ही रह जायेंगे। अतः वे दुःख को
अपने कर्मों का फल और सुख को परमात्मा की कृपा ही मानते
हैं। दूसरे सुख की आशा करना ही मधु है-राग है और दूसरे से
दुःख की आशा करना कैटभ है-

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६६
सर्वोपरि समझनी चाहिए क्योंकि जो राग-द्वेषादि संसारी जनों
के प्रति घातक हैं वही परमात्मा के प्रति समर्पण से साधना है ।
भगवान् के चरणों में ही मधु-कैटभ का वध हुआ है । कितना
सुन्दर संकेत है कि इन दोनों राग-द्वेष का नाश प्रभु के चरणों
में ही होता है ।
सुदर्शन चक्र का भाव भी स्वदर्शन, आत्मबोध है । आत्म-
बोध होने से दोषों से सर्वथा मुक्ति मिल जाती है, क्योंकि
उस आत्मवान् का कोई अपना-पराया नहीं होता है, जब दूसरे
की प्रतीति ही नहीं, तो राग-द्वेष होगा किससे ?
निर्द्वन्द्वो नित्य सत्त्वस्थो निर्योग क्षेम आत्मवान् । गीता ।
आत्म-निष्ठ में निर्द्वन्द्वता, निश्चिन्तता सहज आ जाती
है ‘कोई गैर नहीं कोई और नहीं’, इस निश्चय से जीवन सरस
होता है, क्योंकि राग होने पर विषयों का चिन्तन, चिन्तन से
मिलन की कामना (इच्छा) उदय होती है । कामना-पूर्ति से
लोभ और मोह तथा काम-पूर्ति न होने पर क्रोध, तथा क्रोध से
मोह तत्पश्चात् बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है; विनाश के लक्षण हो
जाते हैं ।
इस संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के आसक्ति-वंश-वृक्ष
विकास का अवलोकन-मनन आवश्यक ही नहीं वरन् वरणीय
है । अतः देखिये :—
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति । गी २/६२
अतः प्रबल शत्रु राग-द्वेष ही हैं इन्हीं से काम-क्रोधादि
प्रकट होते हैं :
काम एष क्रोध एष रजो गुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥गी० ३/३७।

६७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
रजोगुण से उत्पन्न हुये इन दुष्टों को (काम-क्रोध)
महापापी शत्रु समझना चाहिये।
इहैव तैर्जित, सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। गी० ५/१६
शक्नोतीहैव सोढुं प्राक् शरीर विमोक्षणात्
काम-क्रोधोद्भवं वेगं सः मुक्तः सः सुखी नरः॥ ५/५३
शरीर त्याग से पूर्व ही जिन साधकों में इन दुष्टों को
(शत्रुओं) को जीत लिया है, वे ही सुखी हैं, सम हैं तथा
योगी हैं।
इस प्रकार प्रथम चरित्र में भगवद्गीता के उपदेशानुसार
ही राग-द्वेष-मधु कैटभ से निवृत्ति आख्यान के द्वारा समझाई
गई है, और जीवन के विविध व्यावहारिक पक्षों को सुधारने का
संदेश दिया है। समाधि सहित राजा सुरथ ने इस सदुपदेश को
सुना और वे बहुत प्रसन्न हुए।
यही फल श्रुति है :-
काम-क्रोध वियुक्तानां, यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्म निर्वाणं, वर्तते विदितात्मनाम् ॥ गीता५/२६
अर्थात् राग-द्वेष से उत्पन्न होने वाले काम-क्रोध से रहित
होकर योगी परम शान्ति या परम प्रसन्नता का अनुभव करते
हैं, क्योंकि राग-द्वेष से ही राहु और केतु की तरह सूर्य (बुद्धि)
और चन्द्रमा (मन) को ग्रहण करते रहते हैं। एक में सिर है,
विचार तो कर सकता है, किन्तु धड़ न होने से कुछ कर्म नहीं
कर सकता; दूसरे में केवल धड़ है वह विचार नहीं कर सकता है।
यही स्थिति दोनों भाइयों मधु-कैटभ (राग-द्वेष) की यहाँ दिखाई
गई है, जब तक ये नष्ट नहीं होते, जीव को भटकाते ही रहते
हैं। अतः इनसे मुक्ति के लिए माँ पराम्बा भगवती के चरणों में
समर्पित होना चाहिए। जोवन का प्रथम भाग शैशव का होता
है, जो सर्वथा राग-द्वेष रहित होता है। इसो कारण बालक
सबको प्रिय होता है। साधक को विशेषतः करुणामयी माँ के

श्रो दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६८
भक्त को अपना जीवन निष्छल प्रेममय बनाना चाहिए तभी तो
प्रेम-नगर में स्थान मिलेगा ।
आइए हम सब प्रेम से मिलकर गाये—
प्रेम नगर में जाना है ।
जो शीश तली पर धर न सके, वह प्रेम गली में आये क्यों ?
जिसे प्रेम नगर में जाना है, वह जग में चित्त भरमाये क्यों ?
तुझे काम-क्रोध से बचना है, यह माया की सब रचना है ।
जो मन विषयों से मोड़े नहीं, वह भक्ति का ढोंग रचाये क्यों ?
जो प्रेम नगर में रहते हैं, उन्हें लोग बावरा कहते हैं ।
जो ताने जग के सह न सके, वह प्रोतम से नैन मिलाये क्यों ?
जो प्रकाश प्रेम का पा न सके, वह इष्टदेव अपनाएँ क्यों ?

६६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मध्यम चरित्र
द्वितीयोऽध्यायः
द्वितीय-चरित्र-प्रथम चरित्र की भाँति द्वितीय चरित्र भी
आख्यान द्वारा प्रतिपादित किया गया है। श्रोता की श्रद्धा से
द्रवित होक बिना पूछे ही आगे का वर्णन किया गया है; यही
गुरु-कृपा है-शास्त्र-संकेत है-
ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवोः दीन वत्सलाः ।
दीन वत्सल गुरुजनों को स्नेही शिष्यों के लिए तात्विक
उपदेश कहना हो चाहिए। क्योंकि-
गूढ़ तत्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जँहा पावहि ।
इस सिद्धान्त से इसमें गुरु की अहेतु की कृपा ही कारण
है ।
मध्यम चरित्र के द्वितीय अध्याय की कथा से पूर्व माँ का
ध्यान, और इसके विनियोग पर विचार कर लेना आवश्यक है ।
‘ध्यान-विनियोग-कथा’
ध्यानम्
ॐ अक्षस्रक् परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकाम्,
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टा सुरा भाजनम् ।
शूलं पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननाम्;
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोज स्थिताम् ॥
कमलासन पर विराजमान, प्रसन्न मुख मुद्रा से सुशोभित,
महिषासुर-मर्दिनी, भगवती महालक्ष्मी माँ को मैं प्रणाम करता
हूँ, जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, धनुष,
कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शङ्ख, घण्टा, मधु पात्र, शूल,
पाश और चक्र धारण करती है ।
विनियोग
ॐ मध्यम चरित्रस्य विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता,

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७०
उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्वम्,
यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्री महालक्ष्मी प्रीत्यर्थं मध्यम चरित्र जपे
विनियोगः ।
इस चरित्र के ऋषि विष्णु हैं, जैसे ब्रह्मा जी सृष्टि के
रचयिता हैं, वैसे ही श्रीविष्णु भगवान् सृष्टि के पोषण कर्ता हैं।
ब्रह्मा जी वेद-शास्त्र के प्रवर्त्तक हैं। जब समाज में वेद-शास्त्र
पर घात होता है तब वह पालनीय शक्ति कैसे रक्षा करती है ?
इस बात को आप भली भाँति सुन चुके हैं। जब समाज में
उदण्ड, उच्छृंखल, स्वेच्छाचारी दुष्टों का साम्राज्य बढ़ने लगता
है, दैवी गुणों का ह्रास होने लगता है; तब किस प्रकार वह
पालन-पोषणीया शक्ति समाज की रक्षा करती हैं यह कथा अब
सुनाई जायेगी। इस चरित्र के देवता भगवान् की इच्छा शक्ति
महालक्ष्मी हैं लक्ष्मी शब्द के कई अर्थ होने हैं—श्री, विजय,
विभूति (ऐश्वर्य), दीप्ति, कान्ति, नीति, शोभा। जीवन में ये
सभी चीजें प्रत्येक के लिए आवश्यक है। ये कैसे मिले ? इस
युक्ति को इस चरित्र में समझाया गया है। इसमें उष्णिक् छन्द
है, शाकम्भरी शक्ति है। इसमें भक्तों को याद दिलाई गई
है कि जब समाज में घोर दैत्यों का साम्राज्य आ गया था, तो
पराम्बा ने किस प्रकार शाकम्भरी का वेश धारण कर उनका
संहार किया था। यह कथा आप देवी भागवत में पढ़ें। यहाँ
केवल उनकी करुणा के लिए संकेत है।
सम्पूर्ण दुर्ग (क्लेशों) को नष्ट करने वाली माँ दुर्गा
इसका बीज है, वायु तत्व है और यजुर्वेद इसका स्वरूप है इन
सबका स्मरण कर—नाम लेकर हम उनके प्रति कृतज्ञ होते हैं;
और उन्हें नमस्कार करते हैं। जिन्होंने हमें यह चरित्र प्रदान
किया है। इन भगवती के चरणों में प्रणत होकर महर्षि मेधा
जी कहते हैं :—