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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 156 में से

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पृष्ठ 78

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५४
ज्ञानियों, योगियों तथा तपस्वियों को अपने इंगित पर नृत्य
कराती रही है। नारद, पराशर, विश्वामित्र की तो बात ही
क्या, स्वयं ब्रह्मा और शंकर भी इस माया-पाश में आबद्ध हुए
हैं, फिर सामान्य जनों की तो बात ही क्या ? इसलिए साधक को
बहुत सजग एवं सावधान रहना चाहिये ।
वर्तमान में ही एक बहुत बड़े तपस्वी महात्मा भाऊपुर में
रहते थे; वे नित्य प्रातः एवं सायं भ्रमण के लिए ही कुटिया से
निकलते थे। रास्ते में एक परिचित श्रद्धालु देवी पूछती थी
“आप कहाँ जा रहे हैं ? प्रतिदिन वे इस प्रश्न को सुनते थे,
उत्तर नहीं देते थे, नीचे को सिर किये हुए चले जाते थे।
जब उनका अन्तिम समय आया; प्राण जाने वाले थे, तभी
उन महापुरुष ने उस देवी को बुलाया और कहा- देवी !
तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं आज दे सकता हूँ क्योंकि आज मैं
अपने घर जा रहा हूँ। मन की गति बड़ी चञ्चल होती है”
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथी बलवद् दृढम् । (गीता)
शरीर में प्राण रहते हुए कहीं मैं अनुचित घर की ओर कदम न
रख देता, इसी से अब तक उत्तर न दे सका था। इस दृष्टान्त
से हमें भी सीख लेनी चाहिए ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । ५५
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ ५६
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्त र्हेतुभूता सनातनी ॥ ५७
संसार बन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ ५८
यह महामाया ही मेरी माँ है । माँ की करुणा और
वात्सल्य भरा हृदय पुत्र के लिए कल्याणकारी होता है । उनकी
प्रसन्नता ही मुक्ति का वरदान है। वे पराविद्या ही संसार रचती
हैं । संसार-व्यवहार में अज्ञानी-जन अपने को बंधन में बंधा हुआ