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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

५३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(३) निपट अन्ध-उनके लिए दिन भी रात है। जो लोग
ज्ञान-भक्ति दोनों से अलग रहते हैं। चार्वाक् के सिद्धान्तानुसार
'खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ' वाले उदरम्भरी पशु-प्रवृत्ति के हैं
वे इसी श्रेणी के हैं।
आहार-निद्रा-भय-मैथुनञ्च, सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषः धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥
यद्यपि आहार - निद्रा - भय - मैथुन की प्रवृत्तियां पशु -
पक्षियों तथा प्राणीमात्र में समान हैं; किन्तु बुद्धि या ज्ञान ही
मनुष्य को इनसे विलग करता है; जिससे वह अपने को आत्म-
स्वरूप को समझ सकता है। भगवान् कहते हैं-
सब मम प्रिय, सब मम उपजाये ।
सबते अधिक मनुज मोहि भाये॥ (मानस)
मनुष्य ही विवेक का सम्मान करने में समर्थ है। अतः
मनुष्य को ही समस्त शास्त्र-पुराण समझाये जा सकते हैं। वैसे
काकभुशुण्डि जी भी कथा व्यास हैं, किन्तु वे अपवाद हैं। जिस
मनुष्य ने ज्ञान और विवेक का इतना अधिकार प्राप्त किया है;
वही प्राप्त विवेक का अनादर कर दुःखी हो रहा है यही माया
की लीला है, यही भ्रम, भूल एवं अज्ञान है। सूर्य-पुत्र होकर भी
अज्ञानान्धकार में भटकते हुए दुःखी होना जीव की घोर विडम्बना
है। 'तथापि ममतावर्ते मोह गर्ते निपातिताः' समझदार होने पर
भी मनुष्य अपने द्वारा कल्पित तथा निर्मित, मन से माने हुए
स्त्री, पुत्र, मित्रों के जाल में फँस कर मोहित हो जाता है, यही
मोह के गहरे गड्ढे में गिरना है। इससे निकलना बड़ा दुर्लभ
है।
को छूट्यो इहि जाल परि, कत कुरंग अकुलात ।
ज्यों ज्यों सुरझि भज्यो चहत, त्यों त्यों हि उरझि जात ॥
संसार के जाल से निकलना सचमुच ही दुर्लभ है। इसमें
आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् भगवान्
की माया से मोहित हो रहा है। यह महामाया देवी बड़े-बड़े