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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

५५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मानते हैं जबकि बन्धन-काल में भी वह मुक्त ही है । अज्ञता
के कारण ही अपने को बंधा समझता है और बन्धन के कारणों
को कल्पित करके दुःखी होता रहता है ।
कालहिं कर्महि ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाइ (मानस)
इस दुःख में उसकी भूल, उसका अज्ञान ही कारण है ।
विद्वद्जन महामाया शब्द के व्युत्पत्यर्थक भिन्न-भिन्न
अर्थ करते हैं-मीयते जगदनयेति माया अथवा ब्रह्मानन्द साक्षात्कारे
प्रतिषेधं याति माया यद् दृश्यते तन्न सत्यमिति माया अर्थात्
जिससे संसार बनता है । ब्रह्मानंदानुभूति होने पर जिसका
सर्वथा निषेध हो जाता है अथवा जिसके कारण प्रतीयमान
प्रपञ्च सत्य न होने पर भी सत्य सा दिखाई दे रहा है, वही
माया है । यह वेदान्त दर्शन है ।
शाक्त-साधकों के लिए यह महामाया माँ है; माँ के लिये
भक्त की भावना इस रूप में उद्वेलित हुई है-कुपुत्रो जायेत
क्वचिदपि कुमाता न भवति, पुत्र कितना भी कुपुत्र हो जाये,
किन्तु माँ का स्नेहिल हृदय पुत्र के लिये करुणा परिपूर्ण ही
रहता है । माया कृपायां दम्भे च, माया का अर्थ कृपा भी है,
कुम्हार के घड़े का भीतरी हाथ है । भेद केवल दृष्ट का है,
विचार का है; भगवान् के मोहिनी रूप को देख कर देवता
प्रणाम् करते हैं और दानव उद्धत्तता से परिपूर्ण विलासमयी
चितवन् से निहारते हैं ।
इस दैवी भाव की दिव्यता से द्रवित हृदय राजा ने
गुरुदेव के श्रुत उपदेश के पश्चात् पूछा-हे भगवन् ! आप जिसे
महामाया कहते हैं वे कौन हैं ? कृपया उनके प्राकट्य, स्वभाव
एवं चारित्रिक महत्व का वर्णन कीजिए । श्रद्धा एवं प्रेम से
पूछे गये प्रश्न को सुनकर प्रसन्नमना मुनि ने कहा :
नित्यैव सा जगन्मूर्त्तिस्तया सर्वमिदं ततम् । ६४
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।