दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५६
हे राजन् ! वे भगवती पराम्बा नित्य स्वरूप हैं, यह
जगत् उन्हीं का रूप है, सब में वे ही व्याप्त हैं। उनमें सब और
सब में वे ही हैं, तथापि समय समय पर वे देवों की कार्य-सिद्धि
के लिये प्रकट होती हैं; यही उनकी करुणा है, वे साकार होने
पर भी निराकार और निर्विकार ही रहती हैं।
आप लोग इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए—चेतन आत्मा के
स्वरूप को ही यहाँ पराम्बा के रूप में बताया गया है । आप
जानते हैं कि जीवित प्राणियों की देह से तभी तक प्रेम रहता है,
या करते हैं; जबतक उसके भीतर चेतना का अनुभव हो रहा
है। इस से सम्बन्ध हटते ही उसी देह को गंगा में प्रवाहित :कर
दिया जाता है। अतः स्पष्ट हो गया कि प्रेम दीखने वाली;
दिखाई देने वाली देह से नहीं होता अपितु देह में न दिखने
वाले चेतन से होता है; किन्तु अज्ञान के कारण मानव-देह
वियोग का अनुभव करती है।
आप भक्तजन पाषाण-प्रतिमा के सामने भी "मनोजवं
मारुततुल्य वेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्" बोलते समय उस
साकार मूर्ति में व्याप्त चेतन हनुमान जी का ही अनुभव करते
हैं। वही चेतन परमात्मा निरुपाधि होने पर भी उपाधि वाला,
निराकार होने पर भी साकार होने वाला अकारण ही अपनी
कृपा-वश होकर साकार हो जाता है। जैसे भ्रम या भूल वश
कोई व्यक्ति कुएँ में गिर पड़ता है तो उसे निकालने के लिए
'गोताखोर' को भी कुएँ में जाना पड़ता है। ऐसे ही भव कूप में
पड़े हुए जीवों का उद्धार करने के लिए वही कभी राम, कभी
घनश्याम, कभी मोहिनी, कभी स्वयं पराम्बा भगवती के रूप में
अवतरित हो जाता है। भक्तजन उसकी लीलाओं में निमग्न रहते
हैं। ऐसा कहकर महर्षि कथा सुनाने लगे।
कल्प के अन्त में सम्पूर्ण जगत् के एकार्णव (क्षीरसागर)
में निमग्न होने पर विष्णु भगवान् योग निद्रा का आश्रय ले शयन