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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५२
इन्हीं ऋषिचरणों में उपस्थित होकर उनका उपदेश सुन चुका
था, किन्तु उस समय विक्षिप्त था और अब निरुद्ध अवस्था में
होने से समाधि भी साथ है अतः श्रद्धावान् है। श्रद्धावान् लभते
ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः (गीता) । श्रद्धा बिना धर्म नहि होई
(मानस) ।
‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ कहकर ही अर्जुन ने
शिक्षा प्राप्त की थी। श्रद्धावान् के लिए गुरु शरण में पहुँच कर ही
ज्ञान प्राप्ति कही गई है। इसी प्रकार आज गुरु चरणों में अपनी
मोह-व्यथा निवेदन करते हुए सुरथ बोले—
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्ट मानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढ़ता ॥ ४५
ऐसी मूढ़ता या मन की । (विनय पत्रिका)
उपदेश श्रवण की यही परम्परा है, सुनने की बेचैनी हो,
अथाह श्रद्धा हो, योग्य गुरु हो । सब का मधुर मिलन हुआ ।
महर्षि मेधा बोले—हे भाग्यवान् ! जीव मात्र तीन प्रकार के हैं—
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथा परे ।
केचिद् दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्य दृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥ ४८-४६
(१) दिनान्ध-कुछ प्राणी दिन में अन्धे होते हैं । दिन
शब्द काव्य प्रकाश-सप्तम उल्लास में प्रकाश अर्थ में प्रयुक्त हुआ
है । भारत में जन्म, सत्सङ्ग का सुयोग और समय भी अनुकूल,
त्तथापि सत्संग में न जाना, ज्ञान प्राप्त न करने की प्रवृत्ति वाले
दिन में अन्धे हैं ।
(२) रात्र्यन्ध-जिन्हें सत्संग से प्रयोजन ही नहीं है ।
अविवेकी, गुरुतर मूढ़ हैं, किसी हितैषी की भी बात सुनना पसंद
नहीं करते; ऐसे व्यक्ति रात्रि में अन्धे हैं ।