दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर रहे थे; उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ
नाम से विख्यात दो भयंकर असुरों ने जन्म लिया। पैदा होते
ही भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्मा
जी को खाने के लिए दौड़े। उन दोनों भयानक असुरों को अपने
पास आये और भगवान् को सोये हुए देखकर ब्रह्मा जो घबरा
गये। उन्होंने भगवान् को जगाने के लिए एकाग्रचित्त-होकर
उनके नेत्रों में निवास करने वाली योग-निद्रा का स्तवन किया।
इसी स्तुति को 'रात्रि-सूक्त' कहते हैं।
इस कथा का भाव यह है : सर्वत्र व्याप्त सत्ता को विष्णु
कहते हैं। 'विष्लृ व्याप्तौ' वेवेष्टेति विष्णुः वह परमात्मा सर्वत्र,
सर्वथा, सर्वदा होने पर भी सत्वगुण में बुद्धि स्थिर होने पर ही
अनुभव में आता है। रजो गुण और तमो गुण की अवस्था में
उसका अनुभव नहीं होता है। क्षीर सागर सत्वगुण का रूप है।
जल शीतल, सुखद, मधुर होता है—जल जीवन का भी पयोय है,
रस है, 'रसो वै सः' परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है, इसी से
शान्त प्रकृति के साधु महात्मा अपने अन्तःकरण के प्रकाशक
आत्मा को अपने में ही अनुभव करके सदा प्रसन्न रहते हैं। उन
भगवान् की नाभि ही आकाश है। भागवत् में यह प्रयोग आया
है—"नभः एव नाभिः"। इसी व्याप्त आकाश (नाभि) से अना-
सक्ति का प्रतीक कमल पैदा होता है। जिससे ब्रह्मा जी प्रकट
होकर सृष्टि रचना करते हैं।
इस पुराण भाषा को आप समझ गये होंगे कि न आकाश
में कमल पुष्प होता है और न ब्रह्मा जी प्रकट होकर सृष्टि रचना
करते हैं 'यह भाषा प्रतीयमान जगत् परमात्मा है।' के रहस्य को
समझाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। 'सर्वं खल्विदं
ब्रह्म'।
रात्रि-सूक्त में की गई स्तुति बड़ी ही मार्मिक है। यह
स्तोत्र प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या सत्तर से सतासी श्लोक