दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 75, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ें५१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
ये चारों पण्डित सम्पूर्ण रामायण की कथा सूत्रात्मक शैली में
कह रहे हैं। आश्वस्त होकर राजा ने तब उनका सम्मान किया ।
यह कथा 'जैसे तुम भी वैसे हम भी' सुरथ-समाधि के
लिए ही कही गई है । जीव में समाधि (समाहित चित्त की
स्थिति) एक ही होती है । संकल्प-काल में चंचल-वृत्ति का
चित्त है; किन्तु स्थिर होने पर वही आत्मा है। यह योगवाशिष्ठ
में स्पष्ट है । इस प्रकरण में चित्त की अवस्थाओं पर
विच्चार कर लेना अति प्रासङ्गिक होगा ।
चित्त की अवस्थायें :
(१) मूढ़-विकार ग्रस्त तमः प्रधान (२) क्षिप्त-
रजोगुणी, धर्माधर्म दोनों में प्रवृत्ति; यही विक्षिप्त भी है,
जिसमें विशेष मनोराज्य होता है,, जैसे इस समय घर की याद
करके 'सुरथ और समाधि का चित्त हो रहा है (३) सत्वगुणी-
धर्म में प्रवृत्ति (४) एकाग्रावस्था-एक ही विषय में सहज
वृत्तियों का प्रवाह रहता है । (५) निरुद्ध-देशान्तर,
कालान्तर, वस्त्वन्तर की दौड़ छोड़ कर अपनी ओर लौटना ही
दृष्टा ज्ञान है, भान है, अनुभव है। जब तक दृश्य में महत्व
बुद्धि रहेगी, तभी तक दृश्य प्रपञ्च सत्य प्रतीत होता है; अपना
ही स्वरूप जगत् है, यही अवस्था समाधि है ।
संत भोले बाबा ने कहा : इस देह को मैं मानने से एक
दो भासता । दो से बहुत हो जाँय है-एक दूसरे को त्रासता ।
दर्पण भवन कुत्ता घुसा, तो कुत्ता ही सब दिखलात है ।
बैरी समझ कर भौंकता ही भौंकता मर जात है ॥
यही दशा होने पर जीव दुखित होता है ।
अब सुरथ समाधि के साथ हो गयो, तो श्रद्धा का उदय
हुआ । दोनों मिलकर पूज्य भाव से मेधा ऋषि के चरणों में
उपस्थित हुए, श्रद्धावनत होकर प्रणाम किया और विनीत भाव
से पूछा । यहाँ इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि सुरथ