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दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३०
है और 'विच्चे' का अर्थ समर्पण या नमस्कार है; अर्थात् ज्ञान
की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा सम्पूर्ण संकल्पों की
अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी और सम्पूर्ण कर्मों की स्वामिनी महाकाली
स्वरूप में सच्चिदानन्द रूप ही हैं। उनके इस अभिन्नरूप को
नमस्कार है; नमस्कार का अर्थ समर्पण है; व्याकरण में सम्प्रदान
चतुर्थी का यही अर्थ है। इसी से नमः के योग में चतुर्थी होती
है आप ये भी जान चुके हैं कि ये तीनों बीज परमात्मा के
वाचक हैं। सभी आकृतियाँ सत् तत्व में (काली रूप) सभी
प्रतीतियाँ चित् तत्व में (महालक्ष्मी) सभी प्रीतियाँ आनन्द तत्व
(महा सरस्वती) में ही विवर्त हैं।

३१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'रात्रि-सूक्त'
नवार्ण मंत्र के जप के पश्चात् 'रात्रि-सूक्त' स्तोत्र के पाठ
का क्रम है। इसी स्तोत्र के द्वारा ब्रह्माजी ने भगवान् को योग
निद्रा से जगाया था। यह जीव न जाने कब से मोह की रात्रि
में सोया हुआ है। उसका जागरण दैवी आराधना से ही
सम्भव है। रात्रि-सूक्त में पराम्बा की की गई स्तुति अत्यन्त ही
महत्वपूर्ण है। अन्त में बहुत ही स्पष्ट कहा गया है कि तुम ही
इस जगत् की मूल शक्ति हो—
परा पराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।
यच्च किञ्चद् क्वचिद् वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥ रा०सू० १०-११
हे जगदम्बे ! परा एवं अपरा प्रकृति तुम ही हो, जो कुछ
भी स्थूल सूक्ष्म रूप से इन्द्रियगोचर है, तथा प्रकृति से परे तत्व
है; वह सब तुम ही हो। स्पष्टतः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' की यही
घोषणा है। हमारे पुराणों की यही रीति है कि जो प्रति-
पाद्य तत्व परमात्मा है उसी को लक्ष्य रूप से दिखाया जाता है।
चाहे वह नारद-पुराण में नारद, विष्णु-पुराण में विष्णु तथा देवी-
भागवत में देवी को कहा जाय, सबका तत्व एक ही है। वही
ब्रह्म है, परमात्मा है, परा शक्ति है-यया ततमिदं सर्वम् को गीता
में 'येन सर्वमिदम् ततम्' कहा है 'मेरी ओर निहार' गीत में
इसी परमात्मा, परा शक्ति, परम तत्व की करुणामयी उपासना
करके द्रवित किया गया है। गीत की मुख्य पंक्तियाँ उद्धृत हैं—
करुणामय प्रतिपाल प्रभो, करुणा दृष्टि निहार ।
जीवन ज्योति प्रकाशक, प्रियतम मेरी ओर निहार ॥
साधन साध्य उपाय उपेय तुम मेरे हो आधार ।
अबकी बार उबार दयानिधि आयो तेरे द्वार ॥
सब तुममें तुममें सब देखूँ चिद् विलास संसार,
आत्म ब्रह्म की लखूँ एकता अनुभव का दीदार,
अबकी बार उबार दयानिधि, मेरी ओर निहार ॥
भक्ति संगीत सौरभ पृ० १०

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३२
अथ प्रथमोऽध्यायः
दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से आप श्रवण कर रहे हैं कि
जीव राग, द्वेष, स्मिता, अभिनिवेश तथा अविद्या इन पञ्च
क्लेशों से बंधा हुआ है। अपने स्वरूप को पहिचाने बिना जीव
इन पाँचों के बन्धन से छूट नहीं सकता तथा दुःखों से भी
निवृत्ति नहीं हो सकती। प्रेमियो ! मानव-योनि ही एक ऐसा
जीवन हैं जिसमें जीव अपने स्वरूप को जानकर जन्म-मरण के
चक्र से उन्मुक्त हो सकता है। दूसरी योनियों में यह सामर्थ्य
नहीं । आप सब बड़े भाग्यशाली हैं जो भगवती गंगा मैय्या
के तट पर माँ पराम्बा भगवती दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से
राम के दास सम बाबा रामदास के आश्रम में अपने जीवन
दर्शन का श्रवण कर रहे हैं। दुर्गा-सप्तशती में तान चरित्रों
का वर्णन है। हमारे जीवन में भी प्रतिक्षण तीन चरित होते
रहते हैं। पहले मन में इच्छा उदय होती है, तत्पश्चात् उस
इच्छा का ज्ञान होता है और तब उचित इच्छा की पूर्ति के
लिए प्रयत्न होता है। अवस्थायें भी शैशव, यौवन, वृद्ध तीनों
ही हैं। जीवन की पहली अवस्था बचपन है। माँ के पेट से आया
शिशु सबको प्रिय होता है, क्योंकि उसके रोम-रोम में निष्छल
पावन प्रेम झलकता है उसे न किसी के प्रति राग होता है न
द्वेष ही। जैसे ही वह धीरे-धीरे बड़ा होता है, उसकी आँखों
कानों के द्वारा संसार प्रविष्ट होता जाता है। उसमें 'मेरा-तेरा'
का प्रवेश होते ही किसी के प्रति राग तो किसी के प्रति द्वेष
प्रारम्भ हो जाता है। क्रियायें भी तत्त् रूप होने लगती हैं।
यही जीवन की पहली अवस्था है।
दूसरी अवस्था यौवन (जवानो) को है जिसमें विविध
प्रबल इच्छाओं का जन्म होता है। युवक बैठे हो बैठे मनो-
राज्यों द्वारा आकाशो महल बनाते रहते हैं । उनके विचार
उन्हों को झकझोरते रहते हैं। ऐसो अवस्था में यदि किसी

३३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
युवक ने न्यूनाधिक वोल्टेज को नियन्त्रित करने वाले यन्त्र की
तरह सत्संग के स्टेपलाइजार का सेवन किया, आराधना में मन
लगाया, तभी वह सन्तुलित रह सकता है, अन्यथा उसे अपना
जीवन भार बन जाता है; क्योंकि अहंकार की मात्रा उसमें बढ़
जाती है, जो उसे किसी काम का नहीं रहने देता ।
जीवन की तीसरी अवस्था बुढ़ापा है । वृद्धावस्था में रक्त-
बीज की तरह शरीर बूढ़ा होने पर विषय-अभिलाषायें निरन्तर
बढ़ती जाती हैं, माँ की आराधना के प्रयत्न से कैसे इनका दमन
होता है ? यह आप आगे कथा में श्रवण करेंगे ।
अब प्रथम चरित्र के विनियोग से क्या शिक्षा मिलती है,
यह सुनिए—
विनियोग :- ॐ प्रथम चरित्रस्य ब्रह्मा ऋषि, महा काली
देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः रक्त-दन्तिका बीजम्, अग्नि-
स्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्री महाकाली प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
इसके ऋषि स्वयं ब्रह्मा जी हैं; जो वेदों से मंत्र निकालकर
जनता-जनार्दन को देते हैं । ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं, रचना
करने के लिए दो चीजें आवश्यक हैं-एक विवेक और दूसरे कला-
शिल्प (कारीगरी) नैपुण्य । उनके इसी विवेक का प्रतीक हंस है,
जिस पर वे सवार होते हैं । हंस दूध और पानी को विलग कर
देता है । अतः आप समझ लीजिये कि सत्य-असत्य का विवेक
करने वाला ही तो सृष्टि बना सकता है ।
दूसरी आवश्यक वस्तु कला और शिल्प-नैपुण्य (कारीगरी)
है । यदि कुम्हार घड़ा बनाने की कला से अनभिज्ञ है तो वह
मिट्टी, चक्र तथा सूत निमित्त तथा उपादान दोनों कारणों के
विद्यमान होने पर भी घट निर्माण नहीं कर सकता । प्रथम
चरित्र में ब्रह्माजी का नाम लेकर हमें यह शिक्षा दी गई है कि
प्रत्येक कर्म करने के पहले तत्सम्बन्धी विवेक, करने की विधि
एवं कला में नैपुण्य प्राप्त कर लें, तभी उस कार्य में सफलता
मिलती है । यही क्रिया का मूल सृजन करने वाले ब्रह्मा ऋषि

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३४
का प्रयोजन है । एक बात और ध्यान देने की है, जिससे कुछ
लिया जाये, उसके प्रति कृतज्ञता अवश्य व्यक्त करनी चाहिए ।
आजकल तो कृतज्ञता-ज्ञापन का अभाव होता जा रहा है । जिन
गुरुजनों से कुछ भी मिला है, उनके प्रति कृतज्ञता अर्पित करना
तो सामान्य धर्म-मात्र है, सर्वस्व समर्पण ही परम धर्म है । मातृ
देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव । श्रुति भगवती के
ये वचन उक्त कथन का ज्वलन्त प्रमाण है । अपने गुरुजनों के
दोषों को छिपाने वाला ही तो छात्र है । 'वातस्तप वर्षाभ्यः
त्रायते इति छत्रम्, तथा छत्र शीलमस्य इस विग्रह में छत्रादिभ्योऽणः'
सूत्र से छात्र शब्द निष्पन्न होता है । तथ्य यह है कि जैसे छाता
सर्दी, गर्मी तथा वर्षा से रक्षा करता है ऐसे ही छात्रों को गुरु-
जनों की सेवा करनी चाहिए । ग्राह्य सारमपास्य फल्गु के
सिद्धान्तानुसार उनके दोषों को ढाँकना और गुणों को ग्रहण
करना चाहिए । इस कल्याण कारिणी परम्परा को चिर-अक्षुण्ण
बनाये रखने के लिए मैं हृदय से ब्रह्मा जी तथा माँ काली को
कृतज्ञता अर्पित करता हूँ । ये दोनों इस अध्याय में प्रमुख हैं ।
इसमें 'गायत्री छन्द से भी शिक्षा मिलती है, कि सद्बुद्धि मिले
'धियो यो नः प्रचोदयात्' सभी मंत्रों में गायत्री की श्रेष्ठता इसी
इसी कारण है कि इसमें सद्बुद्धि मांगी गई है । कितनी भी
अच्छी कार, सुन्दर प्रशस्त राज पथ हो, किन्तु ड्राईवर बोतल
पीकर बैठा हो तो क्या परिणाम होगा, आप सोचें ।
अतः चालक - सारथि रूपी बुद्धि का अच्छा होना
सर्वोपरि है ।
गीता में स्पष्ट है :—
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ गीता २/६७
यदि इन्द्रियों के अनुसार मन चलेगा तो बुद्धि डगमगा
जायेगी अतः भगवान् श्रीकृष्ण भी बुद्धि की शरण में जाने की
प्रेरणा देते हैं और स्थिर प्रज्ञ होने की दीक्षा देते हैं ।

३५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
आजकल रजोगुणी और तमोगुणी आहार, विहार, व्यव -
हार, विचार होने के कारण बुद्धि दूषित हो जाती है। अतः
सावधान रहना चाहिए। दोषों में बहुत सामञ्जस्य होता है।
जल की भाँति मन की गति भी निम्न-गामिनी होती है। एक
बुराई आते ही और भी बुराईयाँ आने लगती हैं। अतः हमें
सदैव सद्बुद्धि के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए।
पाठ में आगे नन्दा शक्ति का प्रयोग है। इससे हमें सदा
प्रसन्न रहने की शिक्षा मिलती है। शरीर प्रारब्ध से बना है,
अतः शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य मिलेगा। शुभा -
शुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासना सरित्। पौरुष प्रयत्नेन योज-
येत सदा शुभे। शास्त्रों का यह सन्देश हमें जगा रहा है हमारे
पुरुषार्थ को ललकार कह रहा है कि शुभ की ओर ही अग्रसर
रहो; तभी श्रम की सार्थकता है।
आप स्वयं जैसे शुभ और अशुभ के साक्षी हो, वैसे ही
सुख - दुःख के साक्षी हो। सुखी और दुःखी करने वाली जो भी
सम-विषम परिस्थितियाँ उपस्थित हों, उनमें आपको अपनी मनः
स्थिति सम रखनी चाहिए और प्रत्येक स्थिति को भगवान् का
मंगलमय विधान समझना चाहिए।
भागवत में कहा है—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृत विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो भुक्ति पदे स दाय भाक् ॥
भाग-१०/१४/८
भाव यह है कि अपने प्रारब्धानुसार मिली कठिनाइयों या
प्रतिकूल परिस्थितियों को बड़ी प्रसन्नता के साथ भोग लें और
प्रतिपल प्रियतम प्रभु की कृपा का अनुभव करें। जो प्रेम से
हृदय, वाणी और शरीर द्वारा भगवान् का भजन करता है वह
जीवन मुक्त है।
भक्त के जीवन में यह निश्चय होना आवश्यक है कि सभी
वस्तुयें भगवान् की हैं। मुझे सदुपयोग करने के लिए मिली है।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३६
इस निश्चय से शोक और भय दोनों नहीं होंगे। दुःख, दर्द, शोक
और भय तभी होते हैं जब किसी वस्तु और व्यक्ति के साथ
ममत्व जुड़ता है, 'अपना' मानते हैं। वस्तु और व्यक्ति दोनों का
वियोग होना निश्चित ही है अतः दुःख होना भी निश्चित एवं
अवश्यम्भावी है। भूतकाल का शोक और भविष्य का भय होता
है। उदाहरण के लिए एक घटना प्रस्तुत है।
एक सज्जन ने अपना एक मकान बेच दिया। अगले दिन
उसमें आग लग गई। सूचना मिलने पर दुःख होना तो दूर,
प्रसन्न होकर बोले, अच्छा हुआ जो कल बेच दिया था। इतने में
उसके पुत्र ने आकर कहा-उस मकान में अभी मेरा सामान रखा
हुआ है। बस फिर क्या था ? महाशय तुरन्त व्याकुल हो आग
बुझाने के लिए दौड़ पड़े। उधर दूसरे बेटे ने आकर कहा-
पिता जी घबराइए नहीं, अपना सामान मैं सब ले आया हूं। यह
सुनकर भद्र पुरुष शान्त हो गये। मकान जलता रहा, देखते
रहने पर भी लेश-मात्र चिन्ता एवं दुःख न था।
इसका तात्पर्य यह है कि जीव की (अपनी) सृष्टि ही दुःख
देती है। अतः यहाँ नन्दा शक्ति का नाम लेकर यहाँ यह बताया
गया है कि भगवान् में समर्पित होकर शोक-मोह से रहित हो
सकते हो।
रक्त-दन्तिका बीज है। वैप्रचित्त दैत्यों को संहारिणी-इस
शक्ति का नाम है। इनका नाम लेकर स्मरण दिलाया है कि
मेरे भी आसुरी भावों को नष्ट करो। रक्त-दन्तिका पीठ सैदनगर
(जालौन उत्तर प्रदेश) में है।
अग्नि-तत्व है। अग्नि में जलाने और प्रकाशित करने के
दो गुण हैं। पापों को जलाना और दिव्य गुणों को प्रकाश में
लाना दोनों ही जीवन में अनिवार्य हैं।
(क) ऋग्वेद स्वरूप हैं। वेद किसो पुस्तक का नाम नहों
है। वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। हमें अपनो देह से हो यह ज्ञान

३७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मिलता है कि पहले ज्ञानेन्द्रियाँ कार्य करती हैं इसके पश्चात्
कर्मेन्द्रियाँ कार्यरत होती हैं । जैसे पहले आँख देखती है, नाक
सूंघती है तब उस पदार्थ को हाथों के द्वारा मुख में प्रवेश की
स्वीकृति मिलती है ।
(ख) कान दिये दो ईश ने, जिह्वा दीनी एक ।
कहने से सुनना अधिक, सीखो प्रकृति विवेक ॥
(ग) किसी पके फल को आँखें देखती हैं, पैर दौड़ते हैं,
हाथ तोड़कर मुख को देते हैं, दाँत परिश्रम कर जिह्वा को स्वाद
देते हैं तब पेट में पहुँच रस-रक्त आदि बनकर शरीर का पोषण
करता है । यही ग्रहण कर त्यागने की और दूसरों को देने की
शिक्षा वेद से मिलती है—
ईशावास्यमिदंसर्वं, यत्किञ्चित् जगत्यांजगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यचिद्धनम् ॥
इस प्रकार विनियोग द्वारा ब्रह्मादि का स्मरण करके
कृतज्ञता अर्पित की गई है । प्रतिपादित की गई शिक्षाओं को
धारण करना कर्त्तव्य है । यही विनियोग का तात्पर्य है ।
'ध्यानम्'
खड्गं चक्र गदेषु चाप परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शंखं संदधती करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्भूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाद दशकां सेवे महाकालिकां,
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥
शेषशायी भगवान् सोये हुये थे; उनके कर्ण-मल से उत्पन्न
हुये मधु और कैटभ दोनों ही ब्रह्मा जी को खाने के लिये दौड़े ।
तब ब्रह्माजी ने जिस स्वरूप की स्तुति करके अभय प्राप्त किया
था; उन्हीं पराम्बा काली का स्तुवन करता हूँ । वे अपने दस
हाथों में तलवार, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, बन्दूक,
मस्तक तथा शङ्ख धारण किए हुए हैं । दस मुख और दस पैर
हैं । यह परा प्रकृति दसों दिशाओं में व्याप्त है । परमात्मा के

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३८
सत् तत्व में ही कर्म-लीला होती है। पैर गति तथा हाथ कर्म
वाचक है। जहाँ जो कुछ, जैसे भी हो रहा है, होगा और हुआ,
सब कुछ करुणामयी माँ ही हैं। ये भाव धारण करना चाहिए।
इसी माँ को नमन कर प्रारंभ करते हैं। इसमें तीन प्रकरण हैं-
(१) मधु-कैटभ (राग-द्वेष) जन्म (२) ब्रह्मा जी को अभय
प्राप्ति (३) दैत्य-संहार ।
मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं-कथा माध्यम से जीव मात्र
का परिचय सुनिए-
सावर्णि सूर्यस्तनयो यों मनुः कथ्यते ऽष्टमः......।
स्वरोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्र वंशं समुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत् समस्ते क्षिति मण्डले ।
आठवें मनु सूर्य के पुत्र सावर्णि की उत्पत्ति कथा विस्तार
से कहता हूँ। सूर्य कुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के
अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वंतर के स्वामी बने वही प्रसङ्ग
सुनाता हूँ। पूर्वकाल में स्वरोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश में सुरथ
नाम का राजा उत्पन्न हुआ, जिसका समस्त भूमण्डल पर अधि-
कार था।
आठों सिद्धियों से युक्त स्वरोचिष मन्वन्तर में दसों दिशाओं
का स्वामी सुरथ नाम का राजा प्रत्येक जीव ही तो है, जरा इसे
यूँ समझना चाहिए-
(१) सूर्य पुत्र कहने का तात्पर्य है कभी न थके, कभी न
रुके, निरन्तर गतिशील, परम प्रकाशमय स्वरूप, निष्पक्ष कर्म-
शील सूर्य हैं। देखो वेद में भगवान् कहते हैं-सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं
यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति । ऐतरेय ब्राह्मण ३३, ३.५ सूर्य की
विशेषता - निरन्तर परिश्रम - आगे बढ़ते रहना। अतः तुम भी
जीवन में आगे बढ़ो, बढ़ते चलो, यही आपको शिक्षा लेनी है।
भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । गीता ४/१

३६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कर्मयोग सर्व प्रथम सूर्य को दिया गया था। सूर्य के
साम्राज्य में अज्ञानान्धकार के प्रवेश का प्रश्न ही नहीं। दूसरे
सूर्य देता ही रहता है, लेता कुछ नहीं और यदि लेता भी है तो
सहस्रों गुणा करके ही देता है। अतः जीव को भी समाज से
लेना कम और देना अधिक की सीख लेनी चाहिए।
(२) आठों सिद्धियों से युक्त है। सचमुच जीव-मात्र अष्टधा
प्रकृति एवं चैतन्य शक्तियों से सम्पन्न जैसे ईश्वर हैं वैसे ही जीव
भी है, उसमें सर्व शक्तियाँ हैं-स्वाधीन (स्वरोचिष) है; भ्रम से
पराधीन समझ रहा है।
सुरथ-सुष्ठु रथो यस्येति सुरथः-सुन्दर रथ का संकेत
मनुष्य योनि है। 'शरीरं रथमेव' समस्त योनियों में मनुष्य योनि
ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि जीवात्मा सर्व सिद्धियों से युक्त तथा
आत्म कल्याण हेतु मनन करने में समर्थ है।
मनु-(मननात्) पुराणों में मनु-शतरूपा से मनुष्य उत्पत्ति
का भी यही तात्पर्य है कि मनन (मनु) श्रद्धा के योग से ही
मनुष्य है; जिसके जीवन में मनन और श्रद्धा नहीं है वह मनुष्य
वेश में भी मानव नहीं है।
न्याय दर्शन में तो 'मनुष्यत्वावच्छेदकावच्छिन्नो मनुष्य'
मानव धर्मयुक्त ही मनुष्य कहलाता है।
चैत्रवंश-उज्ज्वल वंश है। अतः यह जीव भी उज्ज्वल
वंश का है समस्त भूमण्डल का राजा है, भगवान् का अंश है।
ममैवांशोजीवलोके जीव भूत: सनातनः ॥ गीता १५/७ ॥
राजतेऽसौ राजा-अपनी इन्द्रियों के स्वामी होने पर ही
राजा होता है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो रहा है कि मानव अनेक
ईश्वरीय शक्तियों से सम्पन्न विशिष्ट भगवत्-कृपा पात्र जीव है।
संक्षेपतः उन विशेषताओं का पुनः एक बार सिंहावलोकन कर
लेना युक्ति संगत है।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४०
(१) सूर्य-पुत्र (ज्ञान, कर्म, उपासना में पूर्ण समर्थ)
(२) मनन-श्रद्धा सम्पन्न (३) समस्त सिद्धियों से युक्त
(४) परमात्मा का वंशज (५) सुरथ-समस्त योनियों में श्रेष्ठ
शरीर (६) परम स्वाधीन इन्द्रियों का प्रकाशक (७) राजा-
मन, बुद्धि, इन्द्रियों का शासक (८) पाप-पुण्य पैदा करने
वाला ।
आठ विशेषण सम्पन्न होने पर भी यह अपने को कैसे
दुःखी और कंगाल समझ लेता है-यही मोह लीला का खेल है।
जिस पराम्बा की कृपा से 'महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः'
सर्वश्रेष्ठ राजा होता है। उस कृपा का अनुभव न करके कंगाल
बन जाता है। कहा है-कबहूँक कर करुणा नर देही, देत ईश
बिन हेतु सनेही (मानस)
महामाया प्रभावेण संसार स्थिति कारिणा ।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥ प्रथम ॥५४
आश्चर्य मत करो, यदि कोई राजकुमार अपने को भिखारी
के साथ रहने से भिखारी दास समझ कर दर-दर मांगता घूमे,
तो इसमें पराम्बा का क्या दोष ?
'क्षिति मण्डले'-क्षिति मण्डल का संकेत मूलाधार से है।
अर्थात् पैर के अंगूठे से सिर तक सभी का राजा है - प्रजा पालन
में तत्पर है। प्रजा शब्द से विद्वानों ने भावों को भी ग्रहण किया
है 'प्रकृष्ट रूपेण जायते' इस अर्थ में अपने बनाये मनो राज्यों का
पालन करता है। और यह भी अर्थ है कि व्यवहार में जो
परिवार-समाज मिला है। उसके प्रति स्नेह-प्रेम, सद्भाव पूर्ण
कर्तव्य का निर्वाह कर रहा है। संसार रंगमंच पर प्रत्येक सुरथ
ही सूत्रधार के इशारे से अपना-अपना अभिनय कर रहा है।
कौन किस रूप में निर्वाह कर पाता है यह तो वही जाने। व्यव-
हार में परस्पर सद्भाव प्रेम और सौहार्द आवश्यक है किन्तु यह
पूर्ण निश्चय रहे कि यह रङ्गमंच है। वास्तविक सम्बन्ध पात्रों

४१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
से नहीं है । राधा-कृष्ण बनने वाले दोनों बालकों का मञ्च के
बाहर कोई सम्बन्ध नहीं है । यही निश्चय न होने के कारण
जीव मोह ग्रस्त होकर दुःखी होता है ।
यही दशा अर्जुन की है—श्वेतैर्हयैर्युक्ते, सेनयोरुभयोर्मध्ये,
पूजार्हावरिसूदन; श्यालः सम्बन्धिनस्तथा । यही बात संसारी
जीव की है । इस कथा को मनन करते चलो, अपने को सुरथ
समझो, तब विचार करने में सुविधा रहेगी । प्रवृत्तियों-निवृत्तियों
के बीच में आत्म निरीक्षण करने से विदित हुआ कि सामने खड़े
वीर तो साथी हैं, रिश्तेदार हैं, क्योंकि मैंने ही इन्हें अन्तः करण
में पैदा किया है । समाज या परिवार से स्नेह सौहार्द रखना तो
धर्म है, कर्तव्य है, किन्तु सत्य समझना तथा ममता ग्रस्त होना
ही पराजय का लक्षण है ।
शत्रु दो प्रकार के होते हैं (१) बाह्य (बाहरी) (२) आन्त-
रिक (भीतरी) दोनों ही लुटेरे हैं । सावधानी न रहने पर ही
आक्रमण कर देते हैं । 'श्रीमद् भागवत' में अनेक दृष्टान्त है—
राजा भरत तप करने गये, मृग-शावक में आसक्त हो गये । यह
प्रबल शत्रु मोह है—'मोह सकल व्याधिन कर मूला' । राजा
पुरञ्जन अपनी पत्नी में आसक्त होने के कारण पुनर्जन्म में स्त्री
वेश में आये ।
यहाँ इस प्रसङ्ग में भी यही घटना है—संख्या और बल में
कम होते हुए भी कोलाविध्वंशी शत्रुओं से प्रबल शक्तिशाली
सेना सम्पन्न राजा सुरथ परास्त हो गया । यह यथार्थ है कि
बाहर से आने वाले लोभ मोहादि शत्रु सहज नहीं है; किन्तु
जीवात्मा राजा को तो परास्त कर ही देते हैं चक्रवर्ती सम्राट्,
महाराज दशरथ कैकेयी के पैरों पर गिरे हैं । त्रिभुवन विजयी
रावण सो दस शीश श्वान की नाँई । कुत्ते की तरह बन जाता
है । विश्वामित्र जैसे तपस्वी को काम ने ऐसा पटका कि वर्षों
बीत गये मेनका के साथ ।

मध्यम चरित्र: महिषासुर-मर्दिनी महालक्ष्मी प्रादुर्भाव व वध (अध्याय २-४)

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४२
इन दृष्टान्तों से यहाँ यह सीखना है कि इन विकारों
को कमजोर न समझो और असावधान न रहो। अपने मन का
भरोसा न करो, पूजा अनुष्ठान का अभिमान न करो । सदा
भगवान् की शरण में रहो; विनीत भाव से प्रार्थना करते
रहो—'हे दयामयी माँ ! करुणापूरित नयना, सदार्द्रचित्ता
पराम्बा ! मैं अवोध शिशु की तरह आपकी गोदी में हूँ" कृपा
करके सद्बुद्धि दो । इसी से शाक्त साधक देवी सूक्त के पाठ
का बहुत महत्व मानते हैं ।
सारा ब्रह्माण्ड प्रकृति माँ की गोद ही तो है । इसका
अनुभव करने वाला साधक आये हुए अहंकार, काम क्रोधादि
शत्रुओं से परास्त नहीं होता, किन्तु यह बेचारा सुरथ परास्त
हो गया । रामायण में मेघनाद ने अमोघ शक्ति के द्वारा श्रो
लक्ष्मण जी को बेहोश कर दिया था क्योंकि उस समय श्री
लक्ष्मण जी के साथ न श्री रामजी थे और न संत प्रवर श्री
हनुमान जी । श्री रामजी ज्ञान स्वरूप हैं और हनुमानजी
सद्गुरु स्वरूप । दोनों के अभाव से विवेक रूप लक्ष्मण प्रबल
होने पर भी काम रूप मेघनाद से पराजित हो गये थे जब वे
ही लक्ष्मण जी श्रीरामजी तथा श्री हनुमानजी के साथ होते हैं;
अथवा उनका आश्रय पा लेते हैं तो सदा के लिये कामरूप
मेघनाद को मार डालते हैं । ठीक इसी प्रकार प्रत्येक साधक
को सावधान रहना चाहिये और उन शत्रुओं को कमजोर नहीं
समझना चाहिये ।
कोला विध्वंशी राजाओं से परास्त होकर भी सुरथ चैन
से न रह सका; क्योंकि उसके अन्तरंग साथी मन्त्रियों ने ही
उसका सम्पूर्ण कोष हर लिया । इसका अर्थ यह कि बाह्य की
अपेक्षा अन्तरंग शत्रु अधिक भयंकर एवं घातक होते हैं क्योंकि
उनके प्रति हम उतने सजग नहीं होते । रावण और पृथ्वीराज
की पराजय का कारण अपने ही विभीषण तथा जयचंद रहे ।
अतः अत्यन्त सावधानी एवं सजगता की आवश्यकता है ।

४३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“अमात्यैर्बलिभिर्दु ष्टै दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोशोवलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥”
इस मन्त्र से यही शिक्षा ग्रहण करनी है कि व्यवहार में
अन्तरंग दुष्टात्माओं से किसी भी प्रकार शत्रुता का भाव प्रकट
न होने दें । सुरथ के कोष लुटने का यही भाव है कि शारीरिक
और मानसिक सामर्थ्य समाप्त हो गई । मानव-शरीर में पांच
कोष होते हैं :-(१) अन्नमय कोष-(स्थूल शरीर) (२)
प्राणमय कोष-जिस शक्ति या एनर्जी से क्रियायें सम्पादित होती
हैं (३) मनोमय कोष-(इच्छा-शक्ति) (४) विज्ञानमय कोष
(बुद्धि शक्ति) जिससे सत्-असत्, उचित, अनुचित का निर्णय
किया जाता है । (५) आनन्दमय कोष-जिसके द्वारा सुख की
प्रतीति होती है ।
ये पाँचों कोष आत्मा के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं ।
इन सबका शासक, राजा जीवात्मा है । वही सुरथ है; किन्तु जब
वह अपने को सामर्थ्यहीन, दीन दुर्बल, कंगाल समझने लगता है
तो उसे अपना ही जीवन भार प्रतीत होता है, और सोचता है
कि समाज के सभी लोग हमसे चाहते हैं न कि हमको, सुरथ
की यह अवस्था सभी की है । अब बेचारा स्त्री, पुत्रादि से
अपमानित होने पर घोड़े पर बैठकर बन की ओर चल दिया ।
‘वन-षण सम्भक्तौ’ वन का अर्थ भजनीय स्थान होता है । प्रायः
व्यक्ति ऐसी अवस्था में वैराग्य प्राप्त करता है । जबतक समाज
तथा संसार से निराशा नहीं होती, तब तक भगवान् की ओर कोई
नहीं चलता । इसी से जिन परिवारों में स्त्री-पुत्रादि से बहुत
सुख मिलता है; उन परिवारों में पूर्वज लोग “चौथेपन जाइये नृप
कानन” की बात भूल जाते हैं । सुरथ घर से निकला हुआ
अकेला ही समझ रहा है; किन्तु वासना रूपी घोड़े पर बैठ
कर गया है; तब भला एकाकी कैसे ? ‘एकाकी हयमारुह्य
जगाम गहनं बनम्, विचार करने से विदित होता है कि
साधना स्थल की ओर बढ़ते समय यह वासना साथ नहीं छोड़ती ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४४
यही वासना उसके वैराग्य को शिथिल कर देती हैं यदि इस
वासना का उपासना में परिवर्तन हो जाये, तो काम से हटकर
राम में लगा देती है ।
राजा एक आश्रम में पहुँचा । घोड़े से उतरकर आश्रम के
पवित्र वातावरण को देखने लगा, बहुत से महात्मा साधना में
संलग्न हैं ब्रह्मचारी वेद-ध्वनि कर रहे हैं, होम-धूम अपनी दिव्य
गन्ध समस्त दिशाओं में विकीर्ण कर रहा है, पशु-पक्षी निर्भय
निर्द्वन्द्व निर्वैर विचरण कर रहे हैं । यही आश्रम शब्द का अर्थ
भी है । 'श्रमु तपसि खेदेच' जहाँ धर्म और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ
होता हो वह आश्रम है; और जहाँ अर्थ, काम के लिए पुरुषार्थ
होता है उसे परिश्रम कहते है । आश्रम में अहिंसा की प्रतिष्ठा
होने के कारण निर्वैर भाव नैसर्गिक है । 'अहिंसा प्रतिष्ठाभ्यां
बैर त्यागः' यह निर्वैर भाव मैंने स्वयं देखा है ।
हमारे गुरुदेव पीताम्बरा पीठ दतिया (मध्य प्रदेश) में
प्रातः अपने कक्ष से निकलकर जैसे ही बाहर आते थे; और
प्रसाद वितरण करने लगते थे, वैसे ही कौआ, गिलहरी, बिल्ली
और कुत्ता चारों दौड़कर पृथ्वी पर पड़े प्रसाद को पाने लगते
थे । उनमें परस्पर किसी प्रकार का विरोध नहीं था । अपने -
अपने हिस्से का प्रसाद पा लौट जाते थे । एक बात यह और
निश्चित है कि भजन के परमाणु इतने प्रबल होते हैं कि भजनीय
स्थल आश्रम में विकारों का प्रभाव नहीं पड़ता है; जैसे अकेले
प्रह्लाद पर असंख्य दैत्य बालकों का प्रभाव नहीं पड़ा, अपितु
प्रह्लाद ने ही उपदेश देकर सबको प्रभावित कर लिया था । यही
आश्रम की विशेषता है ।
जिस पवित्र, शान्त, सुरम्य, सिद्ध स्थल पर 'सुरथ' जो
पहुँचे वह 'मेधा' ऋषि का आश्रम था । वे महर्षि बड़े तपस्वी
और धर्मनिष्ठ योगी थे । उन्होंने शान्त, क्लान्त एवं तृषार्त पथिक
को विश्राम दिया और मन को शान्त किया । जैसे शरीर के लिए

४५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
भोजन आवश्यक है वैसे ही बुद्धि के लिए सत्संग का भोजन
परमावश्यक है। ‘मुनिना तेन सत्कृतः’ मननशील महातपा मेधा
ने उन्हें उनके स्वरूप का बोध कराया । यही सत्कृतः' शब्द का
अर्थ है । उन्होंने कहा—‘‘तुम तो राजा हो, अजर, अमर, अवि-
नाशी असंग आत्मा हो। सभी इन्द्रियाँ तुम्हारे शासन में हैं।
जिस परिवार से तुम अपमानित हुए हो, जिस राज्य और कोष
से तुम अपने को वञ्चित (रहित) समझ रहे हो, वह तो तुम्हारा
था ही नहीं।
सपने होइ भिखारी नृप, राजा रंक ते होइ ।
जागे हानि न लाभ कछु, तिमि प्रपञ्च जिय जोइ ॥
स्वप्न में एक राजा भिखारी हो जाता है और भिखारी राजा
बन जाता है; किन्तु जगने पर वह पूर्ववत् अपना स्वरूप ज्यों का
त्यों ही देखता है। ठीक इसी तरह 'तुमने राज्य और परिवार
मेरा है' भूल से यह कल्पना कर ली थी। इसी कल्पना के कारण
तुम दुःखी हो रहे हो। माँ के पेट से आने पर भला कौन मेरा,
कौन तेरा होता है । ‘बीच ही मिले बीच ही छूट जावें। ऐसे
साथी, सामान के प्रति मोह करके दुःखी होना ना समझी है ।
बचपन में बताया अर्थ काम सत्य है ।
जवानी में बताया धरा धाम सत्य है ।
पक्षी जब पिंजड़े से उड़कर चला गया,
तब लोगों ने बताया राम नाम सत्य है ।
इन बातों का ही परिणाम है कि आज समाज में वयोवृद्ध
लोगों की अवहेलना हो रही है । यदि बचपन में बच्चों को यह
शिक्षा दी गई होती कि केवल अर्थ और काम ही सत्य नहीं है,
वरन् राम नाम भी सत्य है; तो बड़े होने पर बालक अपने बड़ों
का अपमान कदापि न करते ।
मेधा ऋषि ने राजा सुरथ को समझाया कि तुम जो यह
चिन्तन कर रहे हो—'मेरी रानी कैसी होगी, बच्चे कैसे होंगे,

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४६
घोड़े कैसे होंगे सो यह सब तुम्हारे राग के कारण हो रहा है।
इस राग को छोड़ो और भगवान् का चिन्तन करो।
आत्म-दर्शन से राग-द्वेष को मारने का सिद्धान्त भगवान्
ने गीता में भी दिया है। गीता के लगभग पन्द्रह-सोलह श्लोकों
में आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी, नित्य शुद्ध-प्रबुद्ध होने
का वर्णन है और देह नाशवान है अतः किसी प्रकार के शोक
का कारण केवल तुम्हारा राग ही है।
जितनी भी आकृतियाँ हैं वे सत् तत्व से भाषित हो रही
हैं, जितनी भी प्रतीतियाँ हैं वे चित् तत्व से और सुख की प्रती-
तियाँ आनन्द तत्व से भाषित हो रही हैं। बुद्धि में यह दृढ़
निश्चय होना चाहिए कि सभी देश में, सभी वेश, सभी काल में
एक परमात्मा ही दीख रहा है—
हर देश में तू, हर वेश में तू,
तेरे नाम अनेक तू एक ही है॥
तेरीं रंग भूमि यह विश्व - धरा,
हर खेल में, मेल में तू ही तू है॥
इस निश्चय के बनाये रखने पर अच्छी या बुरी परिस्थितियों
के आने पर मन सुखी दुःखी नहीं होगा। दिन में न जाने
कितनी बार सत्व, रज, तमोगुण सम्बन्धी नाना वृत्तियाँ आती
और जाती रहती हैं। इनके बदलने पर स्वयं को बदला हुआ
नहीं समझना चाहिए। शास्त्रों में बताई गई परम्परा को नष्ट
करने वाले इन राग-द्वेषादि से सदा ही सावधान रहना
चाहिए।
सावधान जाना ही होगा,
ओ आने वाले इतना समझ ले,
इस जग से तुमको जाना ही होगा।
यदि रह गई हैं कुछ वासनायें,
उनके लिए फिर आना ही होगा॥

४७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब जाना निश्चय ही है फिर इन गीत पंक्तियों को अपना
कण्ठहार बना लेना ही जीवन को सफल बना लेना है—
हरि के भजन में, हो जा रे दीवाना । (टेक)
सपनों की दुनियाँ का, क्या रे ठिकाना ।
कब तक यह दुनियाँ तुझे अपनायेगी, अन्त में तेरे काम न आयेगी ।
झूठी है दुनियाँ, झूठे हैं सारे मीत, झूठी है रीति यहाँ झूठी है रे प्रीत ।
देख मेरे मनुवा, जाल में न आना, सपनों की दुनियाँ का, क्या रे ठिकाना ।
हरि के भजन में, हो जा रे दीवाना ।
इतना समझाने पर राजा सुरथ को आत्म-स्वरूप का कुछ
बोध हुआ, शान्ति मिली, किन्तु कुछ क्षणों तक ही होश रहा ।
“तस्थौ कंचित् स कालम्” और वहाँ से उठकर चल दिया ।
एक तो वासना के साथ गया था । दूसरी बाधा यह थी कि अभी
समाधि साथ नहीं है । समाहित चित्त होना और श्रद्धा दोनों सद्
सम्पत्ति हैं; इनके बिना उपदेश टिकता नहीं है । 'श्रद्धान्वितो
भूत्वा' का यही अर्थ है कि श्रवण के साथ मनन अत्यन्त अपेक्षित
है । तभी सुना हुआ सफल होता है, जब सुनने वाला समझना
चाहे । दृष्टान्त आपके समक्ष है । घनघोर युद्ध काल में श्रीकृष्ण
ने समझाया और अर्जुन ने समझ लिया, किन्तु सञ्जय ने धृतराष्ट्र
को एकान्त में, शान्त वातावरण में सुनाया तब भी कोई
फल नहीं हुआ ।
प्रायः साधकों के जीवन में भी ऐसा देखा गया है कि कुछ
क्षणों के लिए वैराग्य आ जाता है । कहा भी गया है—
चार ठौर सब नरन के कछु वैराग्य चढ़न्त ।
गर्भ माँहि, शव के निकट,
कथा सुनत, रति अन्त ॥
किन्तु यह श्मशानिया वैराग्य दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान के अभाव
में क्षणिक होता है । सांसारिक जीवों को इसो कथित उपर्युक्त
स्थिति का 'सुरथ' नाम के माध्यम दिग्दर्शन कराया है—

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४८
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनि वराश्रमे,
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्ट मानसः ।
मत्पूर्वै पालितं पूर्वं मयाहीनं पुरं हि तत् । १२ ।
न जाने मे सः प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ।
ये ममानुगता नित्यं प्रसाद धन भोजनैः । १४ ।
सञ्चितसोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः । १६ ।
आश्रम से बाहर घूमता हुआ राजा सुरथ चिन्तातुर एवं
शोक ग्रस्त हो सोचने लगा, अहो ! न जाने मेरी प्रजा कैसे होगी,
मेरा मतवाला हाथी कहाँ होगा ? जो लोग रात - दिन सदा मेरे
पीछे लगे रहते थे; भोजन-शयन विश्राम में साथ रहते थे, वे कैसे
होंगे ? इस प्रकार बहुत सी चिन्तायें करने लगा, मोहित हो
गया । किंकर्तव्य विमूढ़ हुआ कुछ क्षणों पूर्व का बैरागी वह
मेधाऋषि से सुना हुआ सभी कुछ भूल गया । अत्यन्त दुखद
एवं विपत्त अवस्था में उसने “वैश्यमेकं ददर्श सः” एक वैश्य
को आते हुए देखा । परस्पर परिचय हुआ, आने का कारण
पूछा, बात-चीत होने लगीं । उसने भी वही परिस्थिति बताई
जो राजा सुरथ का थी । वैश्य के मुख से ही निसृत शब्दावली
द्वारा उसकी दशा का अवलोकन कीजिए :
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले । २१
पुत्रैर्दारैर्निरस्तश्च धन लोभाद साधुभिः
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रै रादाय मे धनम् ।। २२
(१) समाधि (क) समाधीयते सर्वमस्मिन्-जिसमें सब
कुछ लीन हो जाता है । इसका अनुभव करने वाला ही शेष
रहता है ।
(ख) समाधीयते अस्मिन् पुरुषोपयोगाय - मनुष्य की
आवश्यक वस्तुए संकलित की जाय जहाँ ।

४६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(ग) यहाँ समाधि एक का अर्थ समाहित चित्त अधिक
अच्छा है।
(२) वैश्य - जैसे वर्ण-व्यवस्था में समाज के लिए
अत्यन्त उपयोगी है वैसे ही साधक जीवन में लाभप्रद हैं; जो
साधक अभी तक घर-द्वार-परिवार में आसक्त रहा, अब वहाँ से
ऊबकर साध्य को ओर जाना चाहता है वह वैश्य साधक है ।
'विशति साधना विशेषेषु' इस व्युत्पत्ति से यह अर्थ निष्पन्न होता
है । जो अपने भीतर सत्य, क्षमा आदि गुणों की रक्षा के लिए
सावधान है वह क्षत्रिय है और जो ब्रह्म-विज्ञान रस में निमग्न
होना चाहता है अथवा निमग्न है वह ब्राह्मण है । जो इन तीनों
साधकों की प्रेम और श्रद्धा से सेवा करता है वह शूद्र प्रकृति का
है । यद्यपि ब्रह्म-सूत्र भाष्य में 'शुचा द्रवति इति शूद्रः' शोक
ग्रस्त को शूद्र कहते हैं । इसी दृष्टि से सुरथ और समाधि दोनों
शोक-ग्रस्त होने से शुद्र ही हैं; तथापि यहाँ क्षत्रिय और वैश्य
बतलाये गये हैं । इसका अर्थ है राजा सुरथ अपने विकारों
को सावधानी से देख रहा है और उनसे बचने के लिए भी
आतुर है ।
समाधि ने भी राजा को अपनी चिन्ता का कारण अपने
पुत्र स्त्री आदि से अपमानित होना ही बताया उसने
कहा-मित्र ! घर-परिवार वालों से तिरस्कृत होकर निकाला
गया समाधि नाम का वैश्य मैं पुनः उन्हीं की कुशलता की चिन्ता
से व्यथित हूँ 'वे मेरे बेटे कहीं दुराचारी न हो जाएँ । यही गहरी
वेदना है ।" राजा ने कहा-प्यारे जैसे तुम वैसे ही हम, घबराओ
नहीं । स्वभाव से एक सी परिस्थिति वालों में शीघ्र मित्रता
हो जाती है ।
एक बार चार मूर्खों ने एक व्यास का सम्मान देखकर
सोचा-हम भी व्यास हो जायें, तो ऐसा ही सम्मान मिलेगा ।
बस, फिर क्या था, तुरन्त पीताम्बर धारण किये, चन्दन चर्चित