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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 156 में से

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पृष्ठ 63

३६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कर्मयोग सर्व प्रथम सूर्य को दिया गया था। सूर्य के
साम्राज्य में अज्ञानान्धकार के प्रवेश का प्रश्न ही नहीं। दूसरे
सूर्य देता ही रहता है, लेता कुछ नहीं और यदि लेता भी है तो
सहस्रों गुणा करके ही देता है। अतः जीव को भी समाज से
लेना कम और देना अधिक की सीख लेनी चाहिए।
(२) आठों सिद्धियों से युक्त है। सचमुच जीव-मात्र अष्टधा
प्रकृति एवं चैतन्य शक्तियों से सम्पन्न जैसे ईश्वर हैं वैसे ही जीव
भी है, उसमें सर्व शक्तियाँ हैं-स्वाधीन (स्वरोचिष) है; भ्रम से
पराधीन समझ रहा है।
सुरथ-सुष्ठु रथो यस्येति सुरथः-सुन्दर रथ का संकेत
मनुष्य योनि है। 'शरीरं रथमेव' समस्त योनियों में मनुष्य योनि
ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि जीवात्मा सर्व सिद्धियों से युक्त तथा
आत्म कल्याण हेतु मनन करने में समर्थ है।
मनु-(मननात्) पुराणों में मनु-शतरूपा से मनुष्य उत्पत्ति
का भी यही तात्पर्य है कि मनन (मनु) श्रद्धा के योग से ही
मनुष्य है; जिसके जीवन में मनन और श्रद्धा नहीं है वह मनुष्य
वेश में भी मानव नहीं है।
न्याय दर्शन में तो 'मनुष्यत्वावच्छेदकावच्छिन्नो मनुष्य'
मानव धर्मयुक्त ही मनुष्य कहलाता है।
चैत्रवंश-उज्ज्वल वंश है। अतः यह जीव भी उज्ज्वल
वंश का है समस्त भूमण्डल का राजा है, भगवान् का अंश है।
ममैवांशोजीवलोके जीव भूत: सनातनः ॥ गीता १५/७ ॥
राजतेऽसौ राजा-अपनी इन्द्रियों के स्वामी होने पर ही
राजा होता है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो रहा है कि मानव अनेक
ईश्वरीय शक्तियों से सम्पन्न विशिष्ट भगवत्-कृपा पात्र जीव है।
संक्षेपतः उन विशेषताओं का पुनः एक बार सिंहावलोकन कर
लेना युक्ति संगत है।