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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

४१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
से नहीं है । राधा-कृष्ण बनने वाले दोनों बालकों का मञ्च के
बाहर कोई सम्बन्ध नहीं है । यही निश्चय न होने के कारण
जीव मोह ग्रस्त होकर दुःखी होता है ।
यही दशा अर्जुन की है—श्वेतैर्हयैर्युक्ते, सेनयोरुभयोर्मध्ये,
पूजार्हावरिसूदन; श्यालः सम्बन्धिनस्तथा । यही बात संसारी
जीव की है । इस कथा को मनन करते चलो, अपने को सुरथ
समझो, तब विचार करने में सुविधा रहेगी । प्रवृत्तियों-निवृत्तियों
के बीच में आत्म निरीक्षण करने से विदित हुआ कि सामने खड़े
वीर तो साथी हैं, रिश्तेदार हैं, क्योंकि मैंने ही इन्हें अन्तः करण
में पैदा किया है । समाज या परिवार से स्नेह सौहार्द रखना तो
धर्म है, कर्तव्य है, किन्तु सत्य समझना तथा ममता ग्रस्त होना
ही पराजय का लक्षण है ।
शत्रु दो प्रकार के होते हैं (१) बाह्य (बाहरी) (२) आन्त-
रिक (भीतरी) दोनों ही लुटेरे हैं । सावधानी न रहने पर ही
आक्रमण कर देते हैं । 'श्रीमद् भागवत' में अनेक दृष्टान्त है—
राजा भरत तप करने गये, मृग-शावक में आसक्त हो गये । यह
प्रबल शत्रु मोह है—'मोह सकल व्याधिन कर मूला' । राजा
पुरञ्जन अपनी पत्नी में आसक्त होने के कारण पुनर्जन्म में स्त्री
वेश में आये ।
यहाँ इस प्रसङ्ग में भी यही घटना है—संख्या और बल में
कम होते हुए भी कोलाविध्वंशी शत्रुओं से प्रबल शक्तिशाली
सेना सम्पन्न राजा सुरथ परास्त हो गया । यह यथार्थ है कि
बाहर से आने वाले लोभ मोहादि शत्रु सहज नहीं है; किन्तु
जीवात्मा राजा को तो परास्त कर ही देते हैं चक्रवर्ती सम्राट्,
महाराज दशरथ कैकेयी के पैरों पर गिरे हैं । त्रिभुवन विजयी
रावण सो दस शीश श्वान की नाँई । कुत्ते की तरह बन जाता
है । विश्वामित्र जैसे तपस्वी को काम ने ऐसा पटका कि वर्षों
बीत गये मेनका के साथ ।