सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 156 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४८
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनि वराश्रमे,
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्ट मानसः ।
मत्पूर्वै पालितं पूर्वं मयाहीनं पुरं हि तत् । १२ ।
न जाने मे सः प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ।
ये ममानुगता नित्यं प्रसाद धन भोजनैः । १४ ।
सञ्चितसोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः । १६ ।
आश्रम से बाहर घूमता हुआ राजा सुरथ चिन्तातुर एवं
शोक ग्रस्त हो सोचने लगा, अहो ! न जाने मेरी प्रजा कैसे होगी,
मेरा मतवाला हाथी कहाँ होगा ? जो लोग रात - दिन सदा मेरे
पीछे लगे रहते थे; भोजन-शयन विश्राम में साथ रहते थे, वे कैसे
होंगे ? इस प्रकार बहुत सी चिन्तायें करने लगा, मोहित हो
गया । किंकर्तव्य विमूढ़ हुआ कुछ क्षणों पूर्व का बैरागी वह
मेधाऋषि से सुना हुआ सभी कुछ भूल गया । अत्यन्त दुखद
एवं विपत्त अवस्था में उसने “वैश्यमेकं ददर्श सः” एक वैश्य
को आते हुए देखा । परस्पर परिचय हुआ, आने का कारण
पूछा, बात-चीत होने लगीं । उसने भी वही परिस्थिति बताई
जो राजा सुरथ का थी । वैश्य के मुख से ही निसृत शब्दावली
द्वारा उसकी दशा का अवलोकन कीजिए :
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले । २१
पुत्रैर्दारैर्निरस्तश्च धन लोभाद साधुभिः
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रै रादाय मे धनम् ।। २२
(१) समाधि (क) समाधीयते सर्वमस्मिन्-जिसमें सब
कुछ लीन हो जाता है । इसका अनुभव करने वाला ही शेष
रहता है ।
(ख) समाधीयते अस्मिन् पुरुषोपयोगाय - मनुष्य की
आवश्यक वस्तुए संकलित की जाय जहाँ ।