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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

३७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मिलता है कि पहले ज्ञानेन्द्रियाँ कार्य करती हैं इसके पश्चात्
कर्मेन्द्रियाँ कार्यरत होती हैं । जैसे पहले आँख देखती है, नाक
सूंघती है तब उस पदार्थ को हाथों के द्वारा मुख में प्रवेश की
स्वीकृति मिलती है ।
(ख) कान दिये दो ईश ने, जिह्वा दीनी एक ।
कहने से सुनना अधिक, सीखो प्रकृति विवेक ॥
(ग) किसी पके फल को आँखें देखती हैं, पैर दौड़ते हैं,
हाथ तोड़कर मुख को देते हैं, दाँत परिश्रम कर जिह्वा को स्वाद
देते हैं तब पेट में पहुँच रस-रक्त आदि बनकर शरीर का पोषण
करता है । यही ग्रहण कर त्यागने की और दूसरों को देने की
शिक्षा वेद से मिलती है—
ईशावास्यमिदंसर्वं, यत्किञ्चित् जगत्यांजगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यचिद्धनम् ॥
इस प्रकार विनियोग द्वारा ब्रह्मादि का स्मरण करके
कृतज्ञता अर्पित की गई है । प्रतिपादित की गई शिक्षाओं को
धारण करना कर्त्तव्य है । यही विनियोग का तात्पर्य है ।
'ध्यानम्'
खड्गं चक्र गदेषु चाप परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शंखं संदधती करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्भूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाद दशकां सेवे महाकालिकां,
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥
शेषशायी भगवान् सोये हुये थे; उनके कर्ण-मल से उत्पन्न
हुये मधु और कैटभ दोनों ही ब्रह्मा जी को खाने के लिये दौड़े ।
तब ब्रह्माजी ने जिस स्वरूप की स्तुति करके अभय प्राप्त किया
था; उन्हीं पराम्बा काली का स्तुवन करता हूँ । वे अपने दस
हाथों में तलवार, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, बन्दूक,
मस्तक तथा शङ्ख धारण किए हुए हैं । दस मुख और दस पैर
हैं । यह परा प्रकृति दसों दिशाओं में व्याप्त है । परमात्मा के