दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
युवक ने न्यूनाधिक वोल्टेज को नियन्त्रित करने वाले यन्त्र की
तरह सत्संग के स्टेपलाइजार का सेवन किया, आराधना में मन
लगाया, तभी वह सन्तुलित रह सकता है, अन्यथा उसे अपना
जीवन भार बन जाता है; क्योंकि अहंकार की मात्रा उसमें बढ़
जाती है, जो उसे किसी काम का नहीं रहने देता ।
जीवन की तीसरी अवस्था बुढ़ापा है । वृद्धावस्था में रक्त-
बीज की तरह शरीर बूढ़ा होने पर विषय-अभिलाषायें निरन्तर
बढ़ती जाती हैं, माँ की आराधना के प्रयत्न से कैसे इनका दमन
होता है ? यह आप आगे कथा में श्रवण करेंगे ।
अब प्रथम चरित्र के विनियोग से क्या शिक्षा मिलती है,
यह सुनिए—
विनियोग :- ॐ प्रथम चरित्रस्य ब्रह्मा ऋषि, महा काली
देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः रक्त-दन्तिका बीजम्, अग्नि-
स्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्री महाकाली प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
इसके ऋषि स्वयं ब्रह्मा जी हैं; जो वेदों से मंत्र निकालकर
जनता-जनार्दन को देते हैं । ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं, रचना
करने के लिए दो चीजें आवश्यक हैं-एक विवेक और दूसरे कला-
शिल्प (कारीगरी) नैपुण्य । उनके इसी विवेक का प्रतीक हंस है,
जिस पर वे सवार होते हैं । हंस दूध और पानी को विलग कर
देता है । अतः आप समझ लीजिये कि सत्य-असत्य का विवेक
करने वाला ही तो सृष्टि बना सकता है ।
दूसरी आवश्यक वस्तु कला और शिल्प-नैपुण्य (कारीगरी)
है । यदि कुम्हार घड़ा बनाने की कला से अनभिज्ञ है तो वह
मिट्टी, चक्र तथा सूत निमित्त तथा उपादान दोनों कारणों के
विद्यमान होने पर भी घट निर्माण नहीं कर सकता । प्रथम
चरित्र में ब्रह्माजी का नाम लेकर हमें यह शिक्षा दी गई है कि
प्रत्येक कर्म करने के पहले तत्सम्बन्धी विवेक, करने की विधि
एवं कला में नैपुण्य प्राप्त कर लें, तभी उस कार्य में सफलता
मिलती है । यही क्रिया का मूल सृजन करने वाले ब्रह्मा ऋषि