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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 156 में से

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पृष्ठ 56

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३२
अथ प्रथमोऽध्यायः
दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से आप श्रवण कर रहे हैं कि
जीव राग, द्वेष, स्मिता, अभिनिवेश तथा अविद्या इन पञ्च
क्लेशों से बंधा हुआ है। अपने स्वरूप को पहिचाने बिना जीव
इन पाँचों के बन्धन से छूट नहीं सकता तथा दुःखों से भी
निवृत्ति नहीं हो सकती। प्रेमियो ! मानव-योनि ही एक ऐसा
जीवन हैं जिसमें जीव अपने स्वरूप को जानकर जन्म-मरण के
चक्र से उन्मुक्त हो सकता है। दूसरी योनियों में यह सामर्थ्य
नहीं । आप सब बड़े भाग्यशाली हैं जो भगवती गंगा मैय्या
के तट पर माँ पराम्बा भगवती दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से
राम के दास सम बाबा रामदास के आश्रम में अपने जीवन
दर्शन का श्रवण कर रहे हैं। दुर्गा-सप्तशती में तान चरित्रों
का वर्णन है। हमारे जीवन में भी प्रतिक्षण तीन चरित होते
रहते हैं। पहले मन में इच्छा उदय होती है, तत्पश्चात् उस
इच्छा का ज्ञान होता है और तब उचित इच्छा की पूर्ति के
लिए प्रयत्न होता है। अवस्थायें भी शैशव, यौवन, वृद्ध तीनों
ही हैं। जीवन की पहली अवस्था बचपन है। माँ के पेट से आया
शिशु सबको प्रिय होता है, क्योंकि उसके रोम-रोम में निष्छल
पावन प्रेम झलकता है उसे न किसी के प्रति राग होता है न
द्वेष ही। जैसे ही वह धीरे-धीरे बड़ा होता है, उसकी आँखों
कानों के द्वारा संसार प्रविष्ट होता जाता है। उसमें 'मेरा-तेरा'
का प्रवेश होते ही किसी के प्रति राग तो किसी के प्रति द्वेष
प्रारम्भ हो जाता है। क्रियायें भी तत्त् रूप होने लगती हैं।
यही जीवन की पहली अवस्था है।
दूसरी अवस्था यौवन (जवानो) को है जिसमें विविध
प्रबल इच्छाओं का जन्म होता है। युवक बैठे हो बैठे मनो-
राज्यों द्वारा आकाशो महल बनाते रहते हैं । उनके विचार
उन्हों को झकझोरते रहते हैं। ऐसो अवस्था में यदि किसी