दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४२
इन दृष्टान्तों से यहाँ यह सीखना है कि इन विकारों
को कमजोर न समझो और असावधान न रहो। अपने मन का
भरोसा न करो, पूजा अनुष्ठान का अभिमान न करो । सदा
भगवान् की शरण में रहो; विनीत भाव से प्रार्थना करते
रहो—'हे दयामयी माँ ! करुणापूरित नयना, सदार्द्रचित्ता
पराम्बा ! मैं अवोध शिशु की तरह आपकी गोदी में हूँ" कृपा
करके सद्बुद्धि दो । इसी से शाक्त साधक देवी सूक्त के पाठ
का बहुत महत्व मानते हैं ।
सारा ब्रह्माण्ड प्रकृति माँ की गोद ही तो है । इसका
अनुभव करने वाला साधक आये हुए अहंकार, काम क्रोधादि
शत्रुओं से परास्त नहीं होता, किन्तु यह बेचारा सुरथ परास्त
हो गया । रामायण में मेघनाद ने अमोघ शक्ति के द्वारा श्रो
लक्ष्मण जी को बेहोश कर दिया था क्योंकि उस समय श्री
लक्ष्मण जी के साथ न श्री रामजी थे और न संत प्रवर श्री
हनुमान जी । श्री रामजी ज्ञान स्वरूप हैं और हनुमानजी
सद्गुरु स्वरूप । दोनों के अभाव से विवेक रूप लक्ष्मण प्रबल
होने पर भी काम रूप मेघनाद से पराजित हो गये थे जब वे
ही लक्ष्मण जी श्रीरामजी तथा श्री हनुमानजी के साथ होते हैं;
अथवा उनका आश्रय पा लेते हैं तो सदा के लिये कामरूप
मेघनाद को मार डालते हैं । ठीक इसी प्रकार प्रत्येक साधक
को सावधान रहना चाहिये और उन शत्रुओं को कमजोर नहीं
समझना चाहिये ।
कोला विध्वंशी राजाओं से परास्त होकर भी सुरथ चैन
से न रह सका; क्योंकि उसके अन्तरंग साथी मन्त्रियों ने ही
उसका सम्पूर्ण कोष हर लिया । इसका अर्थ यह कि बाह्य की
अपेक्षा अन्तरंग शत्रु अधिक भयंकर एवं घातक होते हैं क्योंकि
उनके प्रति हम उतने सजग नहीं होते । रावण और पृथ्वीराज
की पराजय का कारण अपने ही विभीषण तथा जयचंद रहे ।
अतः अत्यन्त सावधानी एवं सजगता की आवश्यकता है ।