दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
आजकल रजोगुणी और तमोगुणी आहार, विहार, व्यव -
हार, विचार होने के कारण बुद्धि दूषित हो जाती है। अतः
सावधान रहना चाहिए। दोषों में बहुत सामञ्जस्य होता है।
जल की भाँति मन की गति भी निम्न-गामिनी होती है। एक
बुराई आते ही और भी बुराईयाँ आने लगती हैं। अतः हमें
सदैव सद्बुद्धि के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए।
पाठ में आगे नन्दा शक्ति का प्रयोग है। इससे हमें सदा
प्रसन्न रहने की शिक्षा मिलती है। शरीर प्रारब्ध से बना है,
अतः शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य मिलेगा। शुभा -
शुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासना सरित्। पौरुष प्रयत्नेन योज-
येत सदा शुभे। शास्त्रों का यह सन्देश हमें जगा रहा है हमारे
पुरुषार्थ को ललकार कह रहा है कि शुभ की ओर ही अग्रसर
रहो; तभी श्रम की सार्थकता है।
आप स्वयं जैसे शुभ और अशुभ के साक्षी हो, वैसे ही
सुख - दुःख के साक्षी हो। सुखी और दुःखी करने वाली जो भी
सम-विषम परिस्थितियाँ उपस्थित हों, उनमें आपको अपनी मनः
स्थिति सम रखनी चाहिए और प्रत्येक स्थिति को भगवान् का
मंगलमय विधान समझना चाहिए।
भागवत में कहा है—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृत विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो भुक्ति पदे स दाय भाक् ॥
भाग-१०/१४/८
भाव यह है कि अपने प्रारब्धानुसार मिली कठिनाइयों या
प्रतिकूल परिस्थितियों को बड़ी प्रसन्नता के साथ भोग लें और
प्रतिपल प्रियतम प्रभु की कृपा का अनुभव करें। जो प्रेम से
हृदय, वाणी और शरीर द्वारा भगवान् का भजन करता है वह
जीवन मुक्त है।
भक्त के जीवन में यह निश्चय होना आवश्यक है कि सभी
वस्तुयें भगवान् की हैं। मुझे सदुपयोग करने के लिए मिली है।